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शनिवार, 15 अप्रैल 2017

जनकल्याणकारी सरकारें आखिर क्यों 'दारु' पिलाने पर आमादा है?

जनकल्याणकारी सरकारें आखिर क्यों 'दारु' पिलाने पर आमादा है?
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      एराजस्थान में दारु की कम बिक्री पर कुछ समय पहले आबकारी विभाग के अफसरों की सुविधाएं छीन कर सरकार ने दण्डित किया था,अब स्टेट हाईवे का नाम बदलने का खेल चल रहा है!मतलब सरकार का काम दारु के बिना नहीं चल सकता!
     एक नशेड़ी से रुपये कमाने की खातिर 3-4 जिन्दगियों को बर्बाद करने और एक घर को उजाड़ने की सरकारी नीति घोर निंदनीय है,इसके खिलाफ सशक्त जन आंदोलन की सख्त जरुरत है।

मंगलवार, 28 मार्च 2017

सदमे में "छद्म सेक्यूलरिस्ट" !

आदित्यनाथ ने सचमुच ‘योगी’ की तरह सरकार चला दी तो ???
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     ये प्रश्न आज बहुत से लोगों के मन में उठ रहा है और कईंयों के दिलो दिमाग में तूफ़ान पैदा कर रहा है! तथाकथित ‘सेक्युलरिस्टों’ की जमात ने अल्पसंख्यक समुदाय, खासकर मुसलमानों के मन में भगवा रंग और भाजपा के प्रति जैसी धारणा बनादी है,उससे उस समुदाय में यूपी की सरकार और खासकर उसके मुखिया योगी आदित्यनाथ को लेकर आशंकाओं का पैदा होना लाज़मी ही है.हालांकि इस बार के यूपी चुनावों ने अल्पसंख्यकों की इस अवधारणा को ध्वस्त किया है,क्योंकि उन्होंने  भी इस बार भाजपा को वोट किया है,फिर भी ‘छद्म सेक्युलरिस्टों’ की जमात मीडिया में अपनी छाती कूट कर भाजपा के खिलाफ एक भय वाला माहोल बनाने में सक्रीय है.
     आईये अब विचार करते हैं कि आदित्यनाथ अगर सचमुच एक ‘योगी’ की तरह यूपी की सरकार को चलादें तो क्या होगा? क्या यूपी के अल्पसंख्यक,खासकर मुसलमानों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट जाएगा? क्या यूपी साम्प्रदायिक आग में झुलस जाएगा? क्या हिन्दू-मुस्लिम सड़कों पर तलवारें भांजने लग जायेंगे? क्या खून की नदिया बह जायेंगी? जी हाँ,दिग्विजय सिंह,आज़म खान,मायावती,औवेशी और उन जैसे ही अनेकानेक ‘छद्म सेक्युलरिस्टों’ के हिसाब से बिलकुल ऐसा ही होगा, अगर आदित्यनाथ ने बिलकुल ‘योगी’ की तरह सरकार चलादी तो!
    लेकिन यहाँ सिक्के का दूसरा पहलु भी है,और ज्यादा मजबूत भी है! अगर आदित्यनाथ वाकई में एक ‘योगी’ की तरह सरकार चला देते हैं तो माननीय दिग्विजय सिंह, आज़म खान, मायावती और औवेशी जैसे अनेकानेक ‘छद्म सेक्युलरिस्टों’ के सपने कभी पुरे हो ही नहीं सकते! इसलिए नहीं हो सकते क्योंकि एक ‘योगी’,का अपना कोई स्वार्थ नहीं होता, उसके लिए सभी लोग,बिना किसी भेदभाव के,एक सामान होते हैं,उनके संस्कारों में प्रेम, दया, करुणा, अहिंसा, समता, मानवता का वास होता,और वे एक बेहतर ‘रामराज्य’ के अलावा लोगों को कुछ दे ही नहीं सकते! माफ़ कीजिए,वैसा ‘रामराज्य’ नहीं,जैसा कि ‘छद्म सेक्युलरिस्टों’ ने,अल्पसंख्यकों,खासकर मुसलमानों के मन में बिठाया है,जिसमें कि नफ़रत,भेदभाव,हिंसा,का भाव है! किसी ‘सच्चे योगी’ का रामराज्य बिलकुल भगवान् श्री रामजी के राज्य जैसा ही हो सकता है,जहां कि सिर्फ और सिर्फ प्रेम, दया, करुणा, अहिंसा,समता,मानवता का भाव ही था,और जहांकी प्रजा खुशहाल थी.एक ‘योगी’,निरंकुश,जल्लाद,नफ़रत से भरा हुआ,धर्म और जाति के नाम पर भेदभाव करने वाला शासक भला हो भी कैसे सकता है? दशकों से ‘भगवा’ और ‘रामराज्य’ के नाम पर,अल्पसंख्यकों,खासकर मुसलमानों में,‘छद्म सेक्युलरिस्टों’ द्वारा फैलाई गयी भ्रांतियों को तोड़ने का यह सही वक़्त है.योगी आदित्यनाथ को सचमुच अब ‘योगी’ की तरह ही सरकार चलानी चाहिए और सही अर्थों में रामराज्य की स्थापना पर दृढ़ता से आगे बढना चाहिए.वैसे भी एक ‘योगी’ को कौनसा अपनी सात पुश्तों के लिए धन इकट्ठा करना है,या अपने नाते रिश्तेदारों के लिए राजनीति की ज़मीन तैयार करनी है! एक ‘योगी’ के पास आखिर खोने के लिए है ही क्या?? पाने और देने के लिए पूरा ‘रामराज्य’ है,जिसे वे ही पा सकते हैं और वे ही दे सकते हैं.

     आखिर एक ‘योगी’, भ्रष्ट राजनीति और राजनेताओं की कतार में बैठना क्यूँ पसंद करेगा? ‘राजनीति’ को ‘रामनीति’ बनाकर एक योगी ही प्रदेश,देश की दशा और दिशा बदल सकता है.योगी आदित्यनाथ ऐसा कर पायेंगे,ये उम्मीद रखी जा सकती है,क्योंकि सत्ता में आने के दिन से ही योगी आदित्यनाथ ने अपनी सकारात्मक सोच को क्रियान्वित करना शुरू कर दिया है! 
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गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016

!! देशभक्ति का खुमार !!

 !! देशभक्ति का खुमार !! 
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देशभक्ति का हमारा सारा खुमार,
फुटपाथिया दुकानों पर सजे,
चमचमाते,सस्ते किन्तु घटिया 
"चाईनीज" माल को देखते ही 
उतर जाता है ! 

कुम्भकार द्वारा 
मेहनत से बनाए गए 
सुन्दर,पारंपारिक दीयों और 
लाईट की देशी झालरों को देख कर 
उबकाई आती है,
क्योंकि हमारी जीभ तो 
"चाईनीज "माल देख कर ही 
लपलपाती है !

     कड़वा है,
किन्तु क्या करें...सच यही है !!

   इस सच को स्वीकारे बिना 
और फिर इसे झूठ में बदले बिना 
देशभक्ति सही मुकाम नहीं पा सकती।

इस दिवाली जब 
आपके-हमारे घरों में 
दीपक जल रहे होंगे,

सरहद पर 
आपके-हमारे लिए 
शहादत देने वाले किसी 
वीर शहीद के घर 
मातम पसरा होगा,
घनघोर अन्धेरा होगा !

उस वीर शहीद को 
लगी गोलियों में शायद 
कुछ धन हमारा भी हो सकता है,
जो हमने 
विदेशी घटिया माल खरीद कर 
दुश्मन देश को दिया होगा !

    इस दिवाली 
किसी शहीद के घर की 
देहरी को देखलें तो शायद 
दिवाली के अर्थ भी समझ में आएं 
और देशभक्ति के मायने भी !!

!! जय हिन्द !!

शनिवार, 24 सितंबर 2016

!! शहादत की कीमत !!


शहादत की कीमत
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शहादत की कीमत
बहुत है
दो-चार लाख रुपये !



सरहद पर शहीद हुआ
वीर जवान आखिर
इस देश के 
किसी सेठ-साहूकार,
पूंजीपति,दबंग,
मंत्री-नेता-अफसर
या किसी और प्रजाति के
हरामखोर की औलाद
थोड़े ही था !



शहीद नहीं आया था
किसी बंगले,कोठी,महल से,
वो 
टाई,सूट,बूट पहन
कंधे उचका-उचका कर
बोलने वाली
पित्ज़ा-बर्गर वाली पीढ़ी का
प्रतिनिधि भी नहीं था !



शहीद तो आया था
खेत खलिहानों से,
पहाड़ों से,
देहातों से,
शहीद निकला था
टूटे झोंपड़े से,
पगडंडियों वाले
ऊबड़खाबड़ रास्ते से,
धूल से सने हालातों से,
रूखी-सूखी खाते,
फटे कपडे पहनते,
शिक्षा-साधनों को तरसते
माहोल से !



ऐसे शहीद के परिवार को
पैसों की क्या ज़रूरत ?



उसका परिवार
कर लेगा गुज़ारा
रूखी-सुखी खाकर,
अपने जवान बेटे-पति-पिता की
शहादत को याद करते हुए !



देश का पैसा बचा कर रखो
सेठों-साहूकारों,दबंगों
मंत्रियो-नेताओं-अफसरों
पूंजीपतियों-हरामखोरों 
और
उनकी औलादों के लिए!



देश का पैसा
शहीदों पर जाया मत करना,
देश के पैसों पर
सिर्फ हरामखोरों का हक़ है !!!
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मंगलवार, 30 अगस्त 2016

ओल्ड इज गोल्ड !

ओल्ड इज गोल्ड !





पुरानी चीजों को बड़ी हिकारत भरी नज़रों से देखा जाता है।साइकिलों,घोड़ा गाड़ियों,बैल गाड़ियों को आउट ऑफ डेट करार दिया जा चुका है,लेकिन मज़ेदार बात ये है कि जहां पर आधुनिक चीजें भी फ़ैल हो जाती है या ज़वाब दे जाती है,वहां फिर से पुरानी चीजों की सहज याद आती है,क्योंकि वहां वे ही उपयोगी साबित होती है।
    अभी हमारे यहां लगातार चार दिनों तक जम कर बारिश हुई।इंद्रदेव की कृपा 'कोप' में बदल गई।बाढ़ के हालात पैदा हो गए।बिजली गुल हुई तो ऐसी गुल हुई कि पुरे 30 घण्टों बाद आई! इस बीच मोबाइल-नेट सबकुछ धीरे-धीरे ठप्प जो गए।रात में एक तरफ मूसलाधार बारिश दूसरी तरफ घुप्प अन्धेरा! जो अपने घर पर इन्वर्टर लगा इतराते घूमते थे,जब पूरा मोहल्ला घुप्प अँधेरे में डूबा होता और वे अपने घर को इन्वर्टर के बल पर जगमग कर फुले नहीं समाते थे,30 घण्टों की बिजली गुल ने उनके इन्वर्टर के भी होश फाख्ता कर दिए!कुछ घण्टों पहले जो इन्वर्टर खिलखिलाकर हँस रहा था,वो दस-बारह घण्टे बाद ही मुँह लटकाये पड़ा था!
     ऐसे में याद आई तो "लालटेन" (लेंटर्न) की! मैंने घर के स्टोर में पड़ी 25-30 वर्ष पुरानी,जंग लगी लालटेन निकाली,जिसमें शायद 8-10 वर्ष पुरानी बाती भी लगी हुई थी,झाडी-पोंछी और मिट्टी का तेल भर दिया।दियासलाई की एक तीली ने लालटेन को घर का चिराग बना दिया!मेरे 10 वर्ष के बेटे ने जब ये अजूबा देखा तो बोल पड़ा-"पापा,आज कौनसी दीवाली है?" उसने अभी तक इस तरह के कंदील ही दीवाली पर देखे थे!
    आधुनिकता की चकाचौंध में कुछ तथाकथित गयीगुजरी, पुरानी,आउट ऑफ डेटेड घोषित हो चुकी चीजे भी समय आने पर अपनी उपयोगिता दिखा कर सबक दे दिया करती है कि इस दुनिया में कब किसकी ज़रूरत पड़ जाए कहा नहीं जा सकता!!

मंगलवार, 23 अगस्त 2016

!! जीवन तो है ही संघर्ष का नाम !!

जीवन तो है ही संघर्ष का नाम !
   
    'क्या आप परेशान है? बिमारी,आर्थिक तंगी, असफलता,घरेलू झगड़े,आपका पीछा नहीं छोड़ रहे?बेटा-बेटी आपकी आज्ञा के विरुद्ध काम करते हैं?पति-पत्नी में झगड़ा होता रहता है?भाई-बहनों से मनमुटाव है?आपसी संपत्ति का झगड़ा है?भाड़े के फ्लेट में रहते हैं? व्यवसाय में अपने दोस्तों-सम्बन्धियों से पीछे रह गए हैं?लड़का-लड़की बड़े हो गए और उनकी शादी नहीं हो रही है?उधारी अटक गई है?नौकरी कर रहे हैं?अगर आप भी इनमेसे किसी एक या अनेक समस्याओं से ग्रस्त हैं और उनका समाधान चाहते हैं तो हमसे सम्पर्क करें।'
     इस तरह के तमाम विज्ञापन हमारे सामने तकरीबन रोज ही आते रहते हैं,जिनमें कईं 'ज्ञानीजन' तरह तरह के उपाय भी इन समस्याओं के हमें सुझाते हैं।इतना ही नहीं,हमारे आसपास के कईं मिलने वाले भी इन समस्याओं को दूर करने के बहुत से अज़ीबोगरीब रास्ते दिखाते हैं,जिनकी कोई विश्वसनीयता ही नहीं होती! कमाल देखिये कि ऊपर बताई गई समस्याओं मेंसे एक या अनेक हम मेंसे हर एक के जीवन में अवश्य होती ही है।किसी के जीवन में एक,तो किसी के जीवन में अनेक समस्याओं का होना कोई नईं बात नहीं है।नयी बात तो तब होगी,जबकि इस संसार में कोई एक,जी हाँ कोई एक इंसान ऐसा मिल जाए जो कहे कि मुझे किसी तरह की कोई परेशानी नहीं है,कि मेरे पास हर तरह का सुख है।और वास्तव में ऐसा हो भी! क्या ये सम्भव है? क्या जिंदगी मेसे हर तरह के दुःख को निकाल कर सिर्फ सुखों को ही कायम रखा जा सकता है? 
     जी नहीं,ये कदापि संभव ही नहीं है।जीवन तो है ही संघर्ष का नाम,जिसमें तरह-तरह के दुःख, परेशानियां आती ही रहती है।हाँ इसकी मात्रा में अवश्य फर्क हो सकता है।कोई कम दुखी,कम परेशान हो सकता है तो कोई ज्यादा।इन दुखों से,इन परेशानियों से हम बाहर निकलने का,कम करने का प्रयास कर सकते हैं और हमें करना भी चाहिए,जो हम करते भी हैं,किन्तु इसके लिए हमें किसी के बहकावे में आकर गलत मार्ग का चयन कभी नहीं करना चाहिए।पैसे लुटाने से और अंधविश्वासों की राह का पथिक बनने से अगर दुःख-परेशानियां-समस्याएं कम या खत्म हो जाती तो पैसे वालों और अंधविश्वासों का गोरखधंधा चलाने वालों की ज़िन्दगी में कोई दुःख-परेशानी होती ही नहीं और वे दुनिया में सबसे सुखी लोग होते !लेकिन क्या ऐसा है ? ज़रा आप अपने आसपास नज़र घुमा कर देखिये,हक़ीक़त आपको पता चल जायेगी!
     तो फिर आखिर इन तमाम तरह की परेशानियों-समस्याओं-दुखों को दूर करने का तरीका क्या है? तरिका है! तरीका ये है कि अपने भगवान् को,अपने आराध्य को याद करते हुए स्वयं में आत्मविश्वास, सकारात्मक सोच पैदा की जाए,दुःख और सुख दोनों को ज़िन्दगी का अनिवार्य हिस्सा मान कर सहज स्वीकार किया जाए,खुद दुःख, परेशानियां, समस्याओं से मुकाबला करते हुए भी प्राणी मात्र के दुखों,परेशानियों,समस्याओं को बांटने की भावना रखी जाए तथा दुखों-परेशानियों-समस्याओं को भगाने,दूर करने,कम करने का तथा सुखों को बुलाने का निरंतर पुरुषार्थ करते हुए जीवन बिताया जाए !जी हां,इन उपायों के अलावा और कोई उपाय नहीं है ज़िन्दगी को आराम से जीने का !दुखों,परेशानियों,समस्याओं को भी जीवन का अनिवार्य हिस्सा मानकर ही इनकी पीड़ा को कम किया जा सकता।जिंदगी जीने के लिए हवा का होना ज़रूरी है,लेकिन क्या हवा के झोंकें के साथ उड़कर आने वाले और आँख में घुस जाने वाले कचरे को रोका जा सकता है?जीने के लिए पानी का होना ज़रूरी है,लेकिन क्या सौ प्रतिशत शुद्ध और क्रिस्टल क्लियर पानी की ही उम्मीद कभी पूरी हो सकती है?जीने के लिए खाना आवश्यक है,किन्तु क्या बिना मिट्टी/घासपूस/कचरे के अनाज पैदा किया जा सकता है? तो फिर ज़िन्दगी से सिर्फ सुखों की ही उम्मीद क्यों?
     ज़िन्दगी में कचरा,मिट्टी,घासपूस की तरह दुःख, परेशानियां,समस्याएं भी आती ही रहेगी,इन्हें दूर करते रहिये......फिर आएगी......फिर दूर कीजिए......फिर आएँगी......फिर दूर कीजिये ! ज़िन्दगी जीने का इससे बेहतर,सलीकेदार और सच्चा तरीका दुसरा है भी नहीं!
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गुरुवार, 4 अगस्त 2016

!! टूटी सड़क पर 'अच्छे दिनों' की बैलगाड़ी !!

टूटी सड़क पर 'अच्छे दिनों' की बैलगाड़ी ! 

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     पचास साल पुरानी सड़क,लगभग पैंसठ-सत्तर साल के,मोटा ऐनक चढ़ाये "बा'सा" ड्राईवर साहब, मूसलाधार बारिश और बाबा आदम के ज़माने की,बिना 'वाइपर' की बस,जिसमें हार्न के अलावा सबकुछ बजता है!और पैसेंजर फुल्ली भगवान् भरोसे !!ये हैं गाँवों की परिवहन व्यवस्था का कॉम्बिनेशन,जिसे झुठलाया नहीं जा सकता।
     लडखडाती और खड़खड़ाती बस में आप बैठ कर जब अपने 15-20 किलोमीटर दूर गंतव्य पर पहुँचते हैं तब तक आपकी हालात भी उसी बस की तरह हो जाती है,और आपकी बॉडी का एक-एक पार्ट बोलने लगता है! हो सकता है आप इस बस में बैठ कर किसी शादी समारोह में जा रहे हो,और संभव है कि आपको शादी वादी भूलकर बस से उतर कर पहले किसी ओर्थोपेडिक्स के पास अपनी कमर का इलाज़ करवाने जाना पड़े!
     बुलेट ट्रेन,मेट्रो ट्रेन,लोकल ट्रेन.ए सी ट्रेन,हवाई टेक्सी आदि-आदि.....तमाम बातें शहरों-महानगरों के लिए! गाँव के बाशिंदों के लिए एक ढंग की सड़क और बस भी नहीं! क्यों? क्यों इतनी सस्ती और कमतर ज़िन्दगी मान ली गयी है एक गाँव वाले की? जहां पल पल झूठ, बेईमानी, मक्कारी, ठगी, लूट-खसोट की इबारत लिखी जाती रहती है,अच्छे दिनों की सारी सरकारी कवायद उसके हिस्से में,और जहां आज भी सच, ईमान, भोलापन, अपनापन, सहयोग की भावना बची हुई है,उसके हिस्से में भुखमरी,  गरीबी,  अकाल,  अभाव,  बेरुखी....! कहाँ है भारत भाग्य विधाता? 'गरीबी हटाओ' का झुनझुना जैसे पचास सालों तक जनता को बहलाता रहा,वैसे ही 'अच्छे दिनों' का ख्याली पुलाव भी क्या सचमुच कभी पक पायेगा?
     कांग्रेस-भाजपा को कोसने से कुछ नहीं होगा,क्यों कि घूम-फिर कर इन्हें ही आना है!दोष व्यवस्था में है,जो शहरों के वातानुकूलित दफ्तरों में बैठ,मिनरल वाटर पी कर उतना ही सोच पाती है! गाँव से उनको अनाज,दूध,सस्ता श्रम चाहिए और बदले में देने के लिए एक ढंग की सड़क भी नहीं! आखिर गाँव में तरक्की आए भी तो किस रस्ते !
     देश की सेवा की शपथ लेकर बड़ी-बड़ी कुर्सियों पर बैठने वाले मंत्रियों-अफसरों को कुछ वर्षों तक अनिवार्य रूप से गाँवों में बिठाए बिना भारत की आत्मा का कुछ नहीं हो सकता!
     "अच्छे दिनों" का ख़्वाब दिखाने वाले और उनको पार्टी ठेठ भारतीय माने जाते हैं।क्या वे इस पर कुछ विचार करेंगे???
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मंगलवार, 30 जून 2015

!!पगडण्डी!!

!!पगडण्डी!!
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......क्या आपको गाँव की पगडण्डी याद है?अरे वही जो गाँव में कहीं से भी शुरू हो कर कहीं भी चली जाती थी! सड़कें थी ही कहां! कच्चे रस्ते दूर तलक चले जाते थे.साथ साथ पगडण्डीयां भी चलती रहती थी! गाँव में सुबह सवेरे उठ कर जंगल जाना हो या फिर पनघट पर या कि माता जी के मंदिर जाना हो या किसी खुले मैदान में,बस पगडण्डीयां ही सहारा थी.
......इन पगडंडियों पर कितना अपनत्व पलता था! कभी कभार किसी पगडण्डी पर कोई काँटा गिर जाता या कि बड़ा सा पत्थर, जिस भी राहगीर को पहले दिख जाता वो उसे हटाये बिना आगे नहीं बढ़ता! पीछे आने वाले राहगीर की ये चिंता ये ख्याल उस पगडण्डी पर चलने वालों की विशेषता थी! धूल से सनी उजली पगडंडियों के जमाने में उस पर चलने वाले पथिकों के दिल भी उजले हुआ करते थे! आज की सरकारी सड़कें काली कलूटी, जिस पर फुर्र से अपनी ही धुन में गुजर जाने वालों के दिल भी कमोबेश उसी सरकारी काली सड़क के रंग में रंग से गए हैं! इन सड़कों पर कौन आया, कौन गया, किसे याद रहता है! इन काली कलूटी सड़कों पर इंसान कहाँ हैं! इन पर तो सिर्फ वे मशीनें दौड़ती हैं, जिनके सीने में दिल नहीं है. ये मशीने कहाँ पहचानती है इंसानों को! इंसान हो या जानवर इन्हें उनसे कहाँ बात करना आता है! कहाँ उनके साथ चलना, सम्बन्ध बनाना आता है! रिश्ते की गर्माहट उनमें कहाँ! ये तो बस कुचल सकती हैं उनको! सडकें ले जाती है जरुर हमें, लेकिन उस मुकाम पर नहीं पहुंचाती, जहां इंसान,इंसानियत,अपनापन आदि मिले! पगडण्डी ले जाती हैं वहां, जहां इंसान,इंसानियत और अपनापन है! पगडंडियों का कहाँ मुकाबला कर पाती है सड़कें!
......पगडण्डी पर बतियाते हुए पैदल चलते चलते कब कितना रस्ता कट जाता था, किसी को पता ही नहीं चलता! पगडंडियों के आस पास की प्रकृति से राहगीर का सहज संवाद चलता रहता.कंकड़,पत्थर,कांटें,कीड़े-मकोड़े सभी साथ साथ चलते! ना पीछे रहने का गम था ना ही आगे निकल जाने की आपाधापी! आसपास आते जाते हर राहगीर से बातचीत का सिलसिला निकल पड़ता था, जो किसी निकट-दूर के रिश्तेदार से पहचान निकलने तक जा पहुंचता था! इन्हीं पगडंडियों पर कईं सम्बन्ध-रिश्तेदारियाँ भी बन जाती! सही मायने में ये पगडण्डीयां दिल से निकल कर दिल तक पहुंचा करती थी! पगडंडियों का हमराह बना इंसान कब अपने मुकाम पहुँच जाता उसे भी पता नहीं चलता!
......आज कहाँ है पगडण्डीयाँ! कोलतार-सीमेंट की सड़कें निगल गयी इन पगडंडियों को बिलकुल वैसे ही,जैसे स्वार्थ ने इंसानियत को निगल लिया! पगडंडियों पर चलता इंसान बचा हुआ था, उसकी इंसानियत जिंदा थी, उसमें जमीर था, अपनापन था, मुहब्बत थी! पगडंडियाँ जिंदा रखे हुए थी इंसान को! आज की पीढ़ी को पगडण्डी के बारे में मालूम ही कहाँ! हमने भी कब बताया उनको! जरुरत ही नहीं समझी कभी कि इंसान से सरोकार रखने वाली पगडंडी को कभी किस्से-कहानियों में ही सही,अपने बच्चों को बताएं! आखिर हमें सड़कों से ही फुर्सत कहाँ! सरपट भागती जिन्दगी में सड़कें ही तो हो सकती है.....पगडण्डी कहाँ से आए! लेकिन रखना चाहिए,उस पीढ़ी को अपनी बातों किस्सों-कहानियों में पगडण्डी को जरूर रखना चाहिए, जिस पीढ़ी ने पगडंडियों के साथ बहुत सा वक्त गुजारा है. आप भी कभी कभार याद कर लिया कीजिये उन भूली बिसुरी पगडंडियों को........शायद आपको ये बहुत सी सुकून भरी पुरानी बातें भी याद दिला दें!
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रविवार, 11 मई 2014

!!!!! "हाय मॉम,हैप्पी मदर्स डे" !!!!!

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!!!!! "हाय मॉम,हैप्पी मदर्स डे" !!!!!
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हाय मॉम,
आज खुश हो जाओ
आज आपका दिन है !
''अच्छा''!
हाँ 'मॉम',
आज 'मदर्स डे' है !!
''अच्छा''!
हां 'मॉम' !
बोलो 'मॉम'
आपको क्या चाहिए......,
मोबाईल भिजवा दूँ.....
सलवार सूट.......
या कि साडी ठीक रहेगी....!
''अरे नहीं-नहीं बेटा.....''
अरे 'मॉम' 
आज तो कुछ ना कुछ 'गिफ्ट' दूंगा ही....!
अच्छा तो 
आप कहो तो 
ब्रांडेड घडी......
ब्रांडेड चप्पल.........
ब्रेसलेट......
पर्स.......
का पैकेज ही भिजवा देता हूँ.....!
''अरे नहीं-नहीं बेटा.....''
अरे आज तो 'मदर्स डे',
आज तो आपका दिन है.....
आज तो आप जो भी मांगो 
मैं देकर ही रहूंगा.......!!
''अच्छा बेटा,
थोड़ा समय निकाल कर 
घर आ जाओ,
मुझे और तुम्हारे पापा को 
तुम्हारा थोड़ा सा समय चाहिए.....''!
''ओह मॉम......
सॉरी......
ये क्या मांग लिया आपने......????
सॉरी मॉम..... सॉरी.....!!!!!!
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!!!!!!!!!!! हेप्पी मदर्स डे !!!!!!!!!!!
********* अशोक पुनमिया **********
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सोमवार, 28 अक्टूबर 2013

!! अन्धेरे का अट्टहास!!

!! अन्धेरे का अट्टहास!!

उन अंधेरों का क्या कीजे जो कभी नहीं मिटते! 
कितनी सुबहा बीत जाती है...कितनी दिवालियाँ आ कर गुज़र जाती है !!
और उन दीयों का तो हिसाब ही कहाँ,जो हर रोज जलाए गए !!!

रोशनी का कतरा-कतरा निगल जाने वाला अन्धेरा, 
क्यूँ मज़बूत होता जाता है जलाई गयी हर लौ के साथ ? 
क्या 'तकदीरें'लिखने वाला भूल जाता है 
किसी की 'तक़दीर' में उजाला लिखना,
और 'अन्धेरा' ये मान लेता है कि इसके हिस्से में 
मैं ही लिखा गया हूँ !!

'ऊपर वाले' की भूल का खामियाजा 
'नीचे' वाला भुगता है...
रोशनी का कतरा ये कह कर पल्ल्ला झाड लेता है 
कि मैं तुम्हारी तकदीर में लिखा ही नहीं गया...
और 'अन्धेरा' अट्टहास करता रहता है,
आती-जाती सुबहों पर,
मनती दीवालियों पर,
रोज जलाए जाते दीयों पर.....!!!!
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गुरुवार, 1 अगस्त 2013

!! आखिर करता क्या है आदमी???? !!


!!! आखिर करता क्या है आदमी???? !!!
आखिर करता क्या है आदमी????
उठकर सुबह पीता है बैड टी,
पलटते हुए पन्ने अखबार के !
ये अलग बात है कि
मुंह अँधेरे आए दूधिये से उसने 
ले लिया हो दूध 
और चढ़ा दिया हो गैस पर....
या कि 
नल में आते हुए 
म्युनिसिपल्टी के पानी को 
भर दिया हो मटकों में
अल-सुबह....,
और शायद 
बाँध भी दिए हो 
स्कुल जाते बच्चे के 
बूट के फीते
और छोड़ भी आया हो 
स्कुल की बस तक....!!
लेकिन ये भी क्या कोई काम हुआ.....!
तो फिर 
आखिर करता क्या है आदमी????
शेविंग बना,नहा-धोकर 
आराम से करता है 
गरमागरम नाश्ता,
और भाग जाता है दफ्तर 
या कि दुकान पर
घर के कामों से बचते हुए.....!
ये अलग बात है कि
तेज कदमों से पैदल चलते हुए
या कि 
बस -ट्रेन में धक्के खाते हुए
दिमाग उलझा रहता है उसका
पत्नी की छोटी-मोटी पीड़ा में,
या कि
बच्चों को 
अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलाने में.....!!
लेकिन ये कोई काम है क्या?????
तो फिर 
आखिर करता क्या है आदमी????
दफ्तर में
ऐश करता.....
चाय पीता......
गप्पे मारता.....
टाईम पास करता......
या कि
दुकान  पर 
आराम से बैठ 
नोट गिनता है आदमी.......!!
तो फिर 
आखिर करता क्या है आदमी????
ये अलग बात है कि 
दफ्तर में 
बैठा आदमी
कठिन से कठिन काम 
 जल्दी करने का तनाव
भोगता है अनवरत
ताकि तरक्की हो जल्दी 
और बीबी-बच्चों 
की ख्वाहिशों को 
कर पाए पुरा ......
और दुकान  पर नोट गिनता आदमी
अल सुबह से देर रात 
खाना-पीना भूल
करता है हाड़तोड़ मेहनत
ताकि बीबी-बच्चे के ख़्वाब
हो जाए पुरे....!!
लेकिन ये भी क्या कोई काम है?
तो फिर 
आखिर करता क्या है आदमी????
शाम को घर लौटते हुए 
बैठ जाता है किसी 
चाय के ठेले पे
दोस्तों के संग,
बची-खुची गप्पे मारने
और घर के कामों से बचने के लिए ....!!
ये अलग बात है कि
घर बनाने....
या कि 
बच्चों की फीस भरने....
बीबी का इलाज़ करवाने......
बहन की शादी करने.....
आदि-आदि के लिए 
पैसों का जुगाड़ करने के लिए 
चिंतित सा 
दोस्तों से करता हो मशवरा......!!
लेकिन ये भी क्या कोई काम है?????
तो फिर
आखिर करता क्या है आदमी????
रात को 
आदमी आता है दफ्तर/दुकान से.....
सुनता है मांगे बीबी-बच्चों की....
पुरे दिन घूमते-फिरते हुए 
ऐश-मौज करने,गप्पे मारने के 
ताने सुनते हुए
कटवाता है सब्जी,
पानी के साथ 
हलक में उतारते हुए निवाला
 ''दिन भर घर में खटती हुई पत्नी" की 
सुनता है पीड़ा.....
और चिंतन-चिंता की उलझन में उलझ
उनींदा सा सो जाता है आदमी......!!!
तो फिर 
आखिर करता क्या है आदमी????
???????????????????????????????????? 
-- अशोक पुनमिया --  
   

   
  

शनिवार, 9 मार्च 2013

!! गुंडों की 'पोषक' व्यवस्था !!

.....'गुंडे' सिंहासनों की ओट में बेख़ौफ़ है.....कर्तव्यपरायण-देश भक्त लोग गुंडों के हाथों मारे जा रहे हैं.....सत्ता के सिंहासन पर बैठे 'दोगले' लोग, मार डाले गए देश भक्तों और कर्तव्यपरायण लोगों को चंद लाख रुपयों के चेक तथा तमगे दे कर मामले को ख़त्म करने की परम्परा निभा रहे है.....'गुंडे' फिर-फिर अपने कारनामें दोहराने लगते है......'सरकार' फिर-फिर चेक और तमगे बांटती है.....गुंडों की यह 'पोषक' व्यवस्था क्या कभी बदलेगी....????
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शनिवार, 15 दिसंबर 2012

!! दिल से !!

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जब मयस्सर ना हो
रोशनी सूरज की,
जब ना दिखे
दीपक दूर-दूर तक
टिमटिमाता कोई,
जब कोई जुगनू
गुज़रे भी ना
आस-पास से,
और उतर जाए
घना अन्धकार
भीतर तक,
तब
'स्व-चिंतन' की
एक चिंगारी
कर देती है रोशन
पथ को,
जिस पर चलते हुए
मिल जाते हैं
झुण्ड जुगनुओं के,
सजने लगाती है
दीप मालाएं,
और
कईं-कईं सूरज
उगने लगते हैं !
'स्व- चिंतन' की चिंगारी से
अंधेरों को
भष्म होना ही होता है !!

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!! दिल से !!

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सुन रहा हूँ
मौन रह कर
आस-पास पसरी
खामोशियों को....
खामोशियों का
मुखर हो जाना
'गर बन सकता है
मेरी चुप्पी का कारण,
तो किसी दिन
मैं
मुखर भी हो सकूंगा
इन्हीं खामोशियों
के कारण.........!!
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