सोमवार, 28 अक्टूबर 2013

!! अन्धेरे का अट्टहास!!

!! अन्धेरे का अट्टहास!!

उन अंधेरों का क्या कीजे जो कभी नहीं मिटते! 
कितनी सुबहा बीत जाती है...कितनी दिवालियाँ आ कर गुज़र जाती है !!
और उन दीयों का तो हिसाब ही कहाँ,जो हर रोज जलाए गए !!!

रोशनी का कतरा-कतरा निगल जाने वाला अन्धेरा, 
क्यूँ मज़बूत होता जाता है जलाई गयी हर लौ के साथ ? 
क्या 'तकदीरें'लिखने वाला भूल जाता है 
किसी की 'तक़दीर' में उजाला लिखना,
और 'अन्धेरा' ये मान लेता है कि इसके हिस्से में 
मैं ही लिखा गया हूँ !!

'ऊपर वाले' की भूल का खामियाजा 
'नीचे' वाला भुगता है...
रोशनी का कतरा ये कह कर पल्ल्ला झाड लेता है 
कि मैं तुम्हारी तकदीर में लिखा ही नहीं गया...
और 'अन्धेरा' अट्टहास करता रहता है,
आती-जाती सुबहों पर,
मनती दीवालियों पर,
रोज जलाए जाते दीयों पर.....!!!!
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गुरुवार, 1 अगस्त 2013

!! आखिर करता क्या है आदमी???? !!


!!! आखिर करता क्या है आदमी???? !!!
आखिर करता क्या है आदमी????
उठकर सुबह पीता है बैड टी,
पलटते हुए पन्ने अखबार के !
ये अलग बात है कि
मुंह अँधेरे आए दूधिये से उसने 
ले लिया हो दूध 
और चढ़ा दिया हो गैस पर....
या कि 
नल में आते हुए 
म्युनिसिपल्टी के पानी को 
भर दिया हो मटकों में
अल-सुबह....,
और शायद 
बाँध भी दिए हो 
स्कुल जाते बच्चे के 
बूट के फीते
और छोड़ भी आया हो 
स्कुल की बस तक....!!
लेकिन ये भी क्या कोई काम हुआ.....!
तो फिर 
आखिर करता क्या है आदमी????
शेविंग बना,नहा-धोकर 
आराम से करता है 
गरमागरम नाश्ता,
और भाग जाता है दफ्तर 
या कि दुकान पर
घर के कामों से बचते हुए.....!
ये अलग बात है कि
तेज कदमों से पैदल चलते हुए
या कि 
बस -ट्रेन में धक्के खाते हुए
दिमाग उलझा रहता है उसका
पत्नी की छोटी-मोटी पीड़ा में,
या कि
बच्चों को 
अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलाने में.....!!
लेकिन ये कोई काम है क्या?????
तो फिर 
आखिर करता क्या है आदमी????
दफ्तर में
ऐश करता.....
चाय पीता......
गप्पे मारता.....
टाईम पास करता......
या कि
दुकान  पर 
आराम से बैठ 
नोट गिनता है आदमी.......!!
तो फिर 
आखिर करता क्या है आदमी????
ये अलग बात है कि 
दफ्तर में 
बैठा आदमी
कठिन से कठिन काम 
 जल्दी करने का तनाव
भोगता है अनवरत
ताकि तरक्की हो जल्दी 
और बीबी-बच्चों 
की ख्वाहिशों को 
कर पाए पुरा ......
और दुकान  पर नोट गिनता आदमी
अल सुबह से देर रात 
खाना-पीना भूल
करता है हाड़तोड़ मेहनत
ताकि बीबी-बच्चे के ख़्वाब
हो जाए पुरे....!!
लेकिन ये भी क्या कोई काम है?
तो फिर 
आखिर करता क्या है आदमी????
शाम को घर लौटते हुए 
बैठ जाता है किसी 
चाय के ठेले पे
दोस्तों के संग,
बची-खुची गप्पे मारने
और घर के कामों से बचने के लिए ....!!
ये अलग बात है कि
घर बनाने....
या कि 
बच्चों की फीस भरने....
बीबी का इलाज़ करवाने......
बहन की शादी करने.....
आदि-आदि के लिए 
पैसों का जुगाड़ करने के लिए 
चिंतित सा 
दोस्तों से करता हो मशवरा......!!
लेकिन ये भी क्या कोई काम है?????
तो फिर
आखिर करता क्या है आदमी????
रात को 
आदमी आता है दफ्तर/दुकान से.....
सुनता है मांगे बीबी-बच्चों की....
पुरे दिन घूमते-फिरते हुए 
ऐश-मौज करने,गप्पे मारने के 
ताने सुनते हुए
कटवाता है सब्जी,
पानी के साथ 
हलक में उतारते हुए निवाला
 ''दिन भर घर में खटती हुई पत्नी" की 
सुनता है पीड़ा.....
और चिंतन-चिंता की उलझन में उलझ
उनींदा सा सो जाता है आदमी......!!!
तो फिर 
आखिर करता क्या है आदमी????
???????????????????????????????????? 
-- अशोक पुनमिया --  
   

   
  

रविवार, 16 जून 2013

????????? हेप्पी फादर्स डे ?????????

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!!!!! हाय डेड !!!!!
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हाय डेड,
आज खुश हो जाओ
आज आपका दिन है !
''अच्छा''!
हाँ 'डेड',
आज 'फादर्स डे' है !!
''अच्छा''!
हां डेड,
बोलो डेड
आपको क्या चाहिए......,
मोबाईल भिजवा दूँ.....
लेपटॉप.......
या कि टेबलेट ठीक रहेगा....!
''अरे नहीं-नहीं बेटा.....''
अरे डेड 
आज तो कुछ ना कुछ 'गिफ्ट' दूंगा ही....
अच्छा तो 
आप कहो तो 
ब्रांडेड घडी......
शू.........
बेल्ट......
वॉलेट.......
का पैकेज ही भिजवा देता हूँ..... 
''अरे नहीं-नहीं बेटा.....''
अरे डेड,
आज तो आपका दिन है.....
आज तो आप जो भी मांगो 
मैं देकर ही रहूंगा.......!!
''अच्छा बेटा,
थोड़ा समय निकाल कर 
घर आ जाओ,
मुझे और तुम्हारी मां को 
तुम्हारा थोड़ा सा समय चाहिए.....''
''ओह डेड......
सॉरी......
ये क्या मांग दिया आपने......????
सॉरी डेड..... सॉरी.....!!!!!!
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?????????  हेप्पी फादर्स डे ?????????
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शनिवार, 4 मई 2013

!! डूबता हुआ ज़हाज़ और चूहों का जुगाड़ !!


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......हिन्दुस्तान खाने-पिने के शौक़ीन लोगों का देश है ! यहाँ खाना-पीना अनवरत चालु रहता है ! इंसान घर में रहे तो कुछ ना कुछ खाता रहता है.....दफ्तर में जाने के बाद भी अपनी परम्परा निभाता रहता है...!ऑफिस में ऑफिशियाली टेबल के 'ऊपर' से खाता है,और अनऑफ़िशियलि टेबल के 'निचे' से खाता है!मतलब खाना-पीना  कभी रुकता नहीं!
......राजनीति में तो एक से एक महारथी हुए हैं ! सीमेंट,चूना,राशन,सड़कों में खाने वाले तो यहाँ थोक में मिलेंगे जिनका हिसाब रखना भी नानी की याद दिला सकता है ! महाधुरंधरों ने तो 'तोपों,गोला-बारूद,हवाई जहाज़ों,पनडुब्बियों, हेलिकोप्टरों तक को नहीं छोड़ा ! इनको पुरा का पुरा निगल गए और डकार तक नहीं ली ! बचपन के खाने-पीने के शौक ने हाजमा इतना मज़बूत बना दिया कि हर चीज़ हज़म...! 'गौ माता' जब उपवास करने लगी और उसके 'थन' मे से दूध की जगह जब आँखों में पानी आने लगा तो पता चला कि कोई 'स्वनाम धन्य' देश खवैया, गौमाता का चारा ही चर गया है ! अब गौमाता कहाँ अर्जी लगाती ?बेचारी गौमाता यही सोच-सोच कर अपना ग़म कम करती रही कि जिसने भी मेरा चारा खाया होगा वो भी आखिर 'दूध' ही देता होगा ! लेकिन उसे ये देख कर बड़ा दुःख हुआ कि कमबख्त 'वे' सिर्फ 'गोबर' दे रहे हैं....और वो भी किसी काम का नहीं !
......कहते हैं कि "कोयले की दलाली में हाथ काले हो जाते हैं !' होते होंगे ! हमारे लीडरों के पास तो इसका भी तोड़ है ! कोयले को हाथ लगाओ तो हाथ काले होंगे....,अगर सीधा का सीधा उसे 'डकार' ही जाओ तो कहाँ से हाथ काले होंगे ? तो भाई लोग डकार ही गए कोयला ! अब ये अलग बात है कि वो कोयला अन्दर जा कर धधक रहा है और उसकी आंच से बहुत कुछ जल रहा है !! अब बेचारे कोयला खाऊ लोग करते भी क्या....? उन्होंने तो ''कोयले की दलाली...'' वाली कहावत ही सुन रखी थी....! उन्हें थोड़ी ना पता था कि ये कोयला अन्दर जा कर भी धधक सकता है...!!
......अब देखिये, इस देश को ''मामू'' बनाना ही बाकी रह गया था ! 'रेल' ही जब 'मामाश्री' की हो तो फिर तो पूरा 'रेल मंत्रालय' ही 'ननिहाल' हो गया.....और 'नहिहाल' में तो फिर कुछ भी किया जा सकता  है.....! 'मामा' की बहती गंगा में अगर 'भांजा' हाथ ना धोएगा तो फिर कौन धोएगा...? 
......डूबते  हुए ज़हाज़ को देख कर ज़हाज़  पर सवार 'चूहे' अपना जुगाड़ करने में लगे हैं......!! अभी तो आगे-आगे देखिये कईं भांजे,भतीजे,बेटे,चाचा,ताऊ,फूफा, गुल खिलाने बाकी है...!!! 
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