बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

!! मुक्तिका !!

****** !! मुक्तिका !! *****
मज़बूरी है,लाचारी है,
जंग जिंदगी की ज़ारी है !
मिले जीत या हार मिले,
अपनी पूरी तैयारी है ! 
देखता रहा जो 'कटते' मुझको
कल 'उसकी' भी बारी है !
कछुए सा जो है चल रहा ,
ज़रूर काम कोई 'सरकारी' है !
मीठा गटक,कडवा 'थू' कर,
कहती यही दुनियादारी है !
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मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

!! मुक्तिका !!

****** !! मुक्तिका !! *****
जिंदगी का ये हाल है,
कदम-कदम पर इक सवाल है,
मरना भी मुमकिन नहीं -
जीना भी अब मुहाल है !
चेहरों की रंगत का सच,
गाल थप्पड़ से लाल है !
गरीब खाए भी तो क्या ?
दूर उससे रोटी-दाल है !
मार्च तक कम होगी 'महंगाई'
दिल बहलाने को अच्छा ख्याल है ! 
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शनिवार, 29 जनवरी 2011

!! मुक्तिका !!

***** !!  तन्हाईयों का शहर !!*****

तन्हाईयों का घर है !

ये शहर है !!
हर जगह है मेला,
शख्श तन्हा मगर है !!
साथ-साथ है सभी,
किन्तु मन में डर है !!
काम,काम बस काम,
ना शाम ना सहर है !!
खाली है आसमां लेकिन,
परिंदे बे-पर है !!
माफ़ करना ''अशोक'',
बातें मेरी ग़लत अगर है !!.
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शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

!! मुक्तिका !!


**** !! मुझको जो भी दिखा है !! *****

मुझको जो भी दिखा है,
मैंने वो ही लिखा है.
'दांव-पेच' दुनियादारी का,
दुनिया से ही सिखा है.
'शायर' है ग़रीबों का वो,
हर शेर उसका तीखा है.
ढूंढे से भी मिलना मुश्किल,
जिसका इमां ना बिका है.
गले मिले,कोई पकडे गला,
अपना-अपना तरिका है ! 
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------ अशोक पुनमिया ------

बुधवार, 26 जनवरी 2011

!! गणतंत्र !!

******* !! गणतंत्र !!*******

देशभक्ति के गीत भी बज गए !

झंडा भी फहरा दिया !!
'सन्देश' भी सुन लिए !!!
झांकियां भी निकल गयी !!!!
और मिठाई भी बंट गयी........,
एक और
''सरकारी-रस्म'' निपट गयी !!
आईये,फिर मिल-बैठ कर
देश को 'खाएं,
ग़रीब को
'कंगाल' बनायें,
'स्विस' में धन
जमा कराएं,
'वादों' की
घुट्टी पिलाएं !
'तंत्र' का यही
'मूलमंत्र है,
अहा !
मेरे देश में
कितना सुन्दर
(गण) 'तंत्र' है !! 
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मंगलवार, 25 जनवरी 2011

!! वजूद !!

****** *!! वजूद !! ******
''सूरज'' की चाहत है
वो 'रात' को निहारे !
''रात'' की चाहत है 
वो 'सूरज' का दीदार करे !!
मगर दोनों के लिए 
ये मुमकिन नहीं !!
अच्छा है.....
शायद ये ही अच्छा है...
दोनों ही के वजूद के लिए !!!

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 पुनमिया *******

!! गणतंत्र- 2 !!

******* !! गणतंत्र- 2 !!*******
गणतंत्र में 'गण'
हासिये पर पडा है,
और 'तंत्र'
सर पे चढा है !
सबसे निचे की 
पायदान पे खड़े
'गण' को
रोटी-कपड़ा-मकान 
तो क्या,
मयस्सर नहीं है
टमाटर और प्याज !
और तंत्र के सिर-मौर , 
करके अरबो-खरबों के घोटाले
ठोंक कर सीना 
कर रहे हैं राज़ !!
प्रजा है 
बिखरी-बिखरी सी,
चोरों,बेईमानों,गुंडों का
संगठित गिरोह बहुत बड़ा है !
गणतंत्र में 'गण'
हासिये पर पडा है,
और 'तंत्र'
सर पे चढा है ! 
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