शनिवार, 16 जुलाई 2011
बुधवार, 6 जुलाई 2011
!! तड़का मार के !!
""""""""""""""""""""""""""""" """"""""""""""""""""""""""""""""~~~~~~ *** तड़का मार के *** ~~~~~~"""""""""""""""""""""""""""""" """"""""""""""""""""""""""""""" 'चावल' बोला 'दाल' से,मुझ बिन तू अधूरी !चल, 'कुकर' में चलें, कमी करदें पूरी !!|||'साम्भर' कहे 'इडली' से,इतनी मत खुश होय !जो मैं न तेरे साथ तो,तुझे ना पूछे कोय !!|||'वडा' बोला 'पाव' से,रौब से मत कर बात !मुम्बई के ठेलों पर तेरी,मुझ बिन क्या बिसात !!|||'भेल' खडा चौपाटी पर,'पूरी' को बुलाय !आजा मेरी बांहों में,हम 'भेल-पूरी' बन जाय !!|||ठेले पर पडा आम 'लंगडा',झर-झर आंसू बहाय !बोला-मुझे ना पूछे कोई,सब 'हापूस' ले जाय !! """""""""""""""""""""""""""""" """"""""""""""""""""""""""""""""""""""
मंगलवार, 5 जुलाई 2011
शुक्रवार, 1 जुलाई 2011
!! ये कहानी नहीं हकीक़त है !!
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आज सुबह उठा तो मूड कुछ सहज नहीं लग रहा था...थोड़ा सा आलस महसूस हो रहा था.....अपने बगीचे में पहुँच कर देखा तो आसमान बादलों से भरा था...हालांकि बारिश की कोई संभावना नहीं दिख रही थी....ठंडी-ठंडी हवाएं प्रकृति में खो जाने का आमंत्रण दे रही थी.....घर के बाहर खड़े अधेड़ नीम के पेड़ से मेरे बगीचे में गिरी मीठी निबोलियाँ उठा कर मुंह में डाली तो सहज ही अपना बचपन याद आ गया ! अगले ही पल अपनी 25-30 वर्ष पुरानी,भंगार हो चुकी साईकिल को घसीटता हुआ पास ही के पंक्चर निकालने वाले के पास ले गया....एकाध पंक्चर मिला,उसे ठीक करवाया, हवा भरवा, हल्का सा कपड़ा साईकिल पर घुमाकर धूल साफ़ की और उसपर सवार हो गया.....पीछे मुड कर देखा तो साईकिल वाला हंस रहा था....वर्षों बाद अपनी 'खटारा', लेकिन अब भी प्रिय साईकिल पर बैठा तो एकाध बार बेलेंस भी बिगड़ा, लेकिन सुहाने मौसम ने हौसला दिया और मैं प्रकृति का सामीप्य पाने सुनसान रस्ते पर निकल गया.हर पेडल पर मेरी पुरानी साईकिल अलग तरह का संगीत निकाल रही थी.सुनसान से रस्ते पर बस इक्का-दुक्का साईकिलें थी,या फिर कोई पैदल ही आ-जा रहा था.गिलहरियाँ और तितर मेरा रास्ता काट रहे थे....और आस-पास के पेड़ों से किसिम-किसिम के परिंदों की आवाजें आ रही थी.....ठंडी हवाएं और थोड़ी-थोड़ी देर का सन्नाटा मुझे अजीब से सुकून से भर रहा था.....सड़क पर बिखरी बचपन की अनगिनत यादों को मैं समेटता जा रहा था.....मन चाह रहा था कि यह सफ़र कभी ख़त्म ही ना हो....लेकिन ये संभव नहीं था....मैंने साईकिल मोड़ी और घर की तरफ बढ़ चला.....मेरा मूड बिलकुल बदल चुका था.....एकदम तरोताजा महसूस कर रहा था मैं ! वर्षों बाद मैं अपना बचपन जी आया था,चाहे चंद लम्हों के लिए ही सही....!! आप भी कभी थक जाए, किसी तनाव में आ जाए, या कभी बात-बेबात मूड उखड जाए तो कुछ लम्हों के लिए उबड़-खाबड़,पुराने,एकांत रास्तों पर निकल पड़े --अपनी नयी या खटारा साईकिल पर और प्रकृति से दो-चार बातें कर लौट आयें....एक सुकून के साथ...नयी उर्जा के साथ...!!!! ( ये कहानी नहीं हकीक़त है). ****************************************************************
बुधवार, 29 जून 2011
!! शायद कोई इंसान होगा !!
********************************************** **कह देना आज ये बहुत ही आसान होगा !कि मुट्ठी में कल मेरी ये जहान होगा !!खबर नहीं जब यहाँ अगले ही पल की,कल की बात,बिन नींव का मकान होगा !.वो शरीके ग़म हो अजनबी के खूब रोया,कलयुग में बचा वो शायद कोई इंसान होगा !झूठ ही समझना इसे 'गर मैं कहूँ किसी दिन,डिगा ना अब तलक कभी मेरा ईमान होगा !मानता हूँ ऐब है बहुत मेरी शायरी में ,मगरकुछ तो मेरा भी अलग अंदाज़े बयाँ होगा !एक 'अन्ना-बाबा' काफी नहीं बेईमानों के लिए,आयेगा इन्कलाब,जब खडा 'हिन्दुस्तान' होगा !!********************************************** **
रविवार, 19 जून 2011
!! प्रणाम पिता जी !!
**************************''पिताजी''दुनिया आज आपका दिन मना रही है,.बहुत से बेटों कोआपकी सही में और बहुत से बेटों कोआपकी दिखावटी'याद' आ रही है !आज का दिन छोड़ देंतो बाकी के 364 दिन आप कहाँ थे .....?कैसे थे ..... ?,आराम से थे कि 'जैसे-तैसे' थे ! कुछ बेटों को ये जानने की फुर्सत नहीं थी, और 'गर उन्हें फुर्सत थी तो ''घरवाली'' कीइजाज़त नहीं थी !!''पिताजी''ये दुनिया बड़ी अजीब है,जो बेटे बचपन में 'पिता' की अंगुलियाँ पकड़ कर चलते हैं,वे ही ''बेटे''बड़े हो कर ''पिता'' को'अंगूठा' दिखा देते हैं !!!खैर,'पिताजी'इस दिखावटी दुनिया में आज के दिन आपको मेरा भी ''प्रणाम'' !!!
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शनिवार, 18 जून 2011
!! गाँव बुलाता है !!
!! गाँव बुलाता है !!
*****************************************रेगिस्तान से तपतेशहर में जबजलने लगते हैं पाँवऔरझुलसने लगता है बदन,तब बड़ा याद आता हैगाँव,नीम और पीपल कीछाँव !अच्छी लगने लगती है तबशहर के प्रदूषण सेगाँव की धूल,शहर के गटर सेगाँव की नालियां,और शहर के कूड़े-करकट सेगाँव में छितराया हुआगोबर !और सूट-बूट-टाई में लिपटीमशीनों की जगहधोती-गमछे औरघूँघट के पीछे के''इंसान'' !अक्सर गाँव बुलाता है....याद भी आता है......मगरलौट के ''वो''आये भी कैसे....!!शहर की ''हवा'' कीलत जो लग गयी हैउनकी साँसों को........... !!
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शनिवार, 11 जून 2011
!! मुक्तिका !!
!! मुक्तिका !!
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हवाएं ठंडी बहुत ही भाती है छत पर !
नींद सुकूं भरी रात में आती है छत पर !!
नींद उड़ भी जाए तो ग़म होता नहीं है ,
चाँद-सितारों से गुफ्तगू हो जाती है छत पर !
दिन में निचोड़ा है सूरज ने बदन को,
रात भर चांदनी,अमृत पिलाती है छत पर !
माना कूलर -ए.सी. का ज़माना है यारों ,
'रूह' तक ठंडक पहुँच पाती है छत पर !
'चाँद' देखने छत पर चढ़ते थे दिन में 'अशोक',
यादें लड़कपन की गुदगुदाती है छत पर !!
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मंगलवार, 7 जून 2011
!! अघोषित कर्फ्यू !!
***********************************************************हमारे यहाँ अघोषित कर्फ्यू लगा है !
सुबह के 11 बजे से शाम के 6 बजे तक घर से बाहर निकलने की हिम्मत जुटाना बड़ी बात हो गयी है !पारे ने 45-46 पर डेरा जमा रखा है !
चाय की थडियों पर चूल्हे ठण्डे पड़े हैं,भगोने औंधे मुंह तिरस्कृत से हैं,चाय की पत्ती उबाले जाने के इंतज़ार में रुआंसी सी हैं और शक्कर अलग-थलग पड़ी खुद को ही कडवा मह्सूश कर रही है!
कुल्हड़ अपने कद्रदानों के मुंह लगने को बेताब से हैं और थडी वाला माथे पर सलवटें डाल चिंतित सा बैठा है ! गर्मी,प्राणियों को कपडे की तरह निचोड़ने को आमादा है !!
यह स्थिति कब बदलेगी कहा नहीं जा सकता ! जून के महीने के अभी भी 23 दिन बचे हैं,केलेंडर यह दिखा-दिखा कर डराए जा रहा है !
कुल मिला कर बात थोड़ी सी अजीब है,मगर इस गर्मी ने सबको ''ठंडा'' कर रखा है !!!
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सोमवार, 6 जून 2011
बाकी सब ठीक है !
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प्रिय मित्रों,इस गर्मी में हाल बेहाल है,और बस,बाकी सब ठीक है !
मैंने तो नहीं मापा,लेकिन अखबार वाले बता रहे हैं कि आज-कल पारा 43-44 के आस-पास चल रहा है,अब ऐसे में आप जानों कि क्या हालत होती होगी !शारीर सारे दिन पसीने से लथ-पथ रहता है.पर इसका भी एक फायदा है,आज-कल स्नान नहीं करना पड़ता ! क्योंकि शारीर वैसे ही पसीने से पानी-पानी हो जाता है ! हाँ, तौलिये से पोंछने की कसरत ज़रूर करनी पड़ती है ! वैसे,बाकी सब ठीक है !
घर से बाहर निकलो तो 'लू' के थपेड़े थप्पडें मार-मार कर गाल लाल कर देते हैं ! पर इसका भी एक फायदा है,जब भी 'चाय' पीने की इच्छा होती है,मुंह में थोड़ा दूध,चाय -पत्ती,और शक्कर डाल कर 'लू' में निकल लेते हैं और एक उबाल आते ही गटक लेते हैं !वैसे,बाकी सब ठीक है!
दिन के उजाले में बिजली की ज़रूरत नहीं होती इसलिए बिजली विभाग बिजली नहीं देता,और रात में 'पॉवर -कट' चलता है इसलिए बिजली नहीं आती !ऐसे में रात में अगर घर में निचे सोएं तो रात भर नींद नहीं आती,इसलिए छत पर सोने चले जाते हैं.हालांकि नींद तो छत पर भी नहीं आती,लेकिन इसका भी एक फायदा है,कि पूरी रात 'तारे' और 'मच्छर' गिन-गिन कर आसानी से काटी जा सकती है!वैसे बाकी सब ठीक है !
माफ़ करना,अपना ही हाल बताता गया,आपका तो पूछा ही नहीं !वैसे बाकी सब ठीक है,लेकिन फिर भी अगर इस गर्मी में ''बाकी''कुछ बच गया हो तो आप भी बताइये !
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