बुधवार, 19 दिसंबर 2012
शनिवार, 15 दिसंबर 2012
!! दिल से !!
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जब मयस्सर ना हो
रोशनी सूरज की,
जब ना दिखे
दीपक दूर-दूर तक
टिमटिमाता कोई,
जब कोई जुगनू
गुज़रे भी ना
आस-पास से,
और उतर जाए
जब मयस्सर ना हो
रोशनी सूरज की,
जब ना दिखे
दीपक दूर-दूर तक
टिमटिमाता कोई,
जब कोई जुगनू
गुज़रे भी ना
आस-पास से,
और उतर जाए
घना अन्धकार
भीतर तक,
तब
'स्व-चिंतन' की
एक चिंगारी
कर देती है रोशन
पथ को,
जिस पर चलते हुए
मिल जाते हैं
झुण्ड जुगनुओं के,
सजने लगाती है
दीप मालाएं,
और
कईं-कईं सूरज
उगने लगते हैं !
'स्व- चिंतन' की चिंगारी से
अंधेरों को
भष्म होना ही होता है !!
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भीतर तक,
तब
'स्व-चिंतन' की
एक चिंगारी
कर देती है रोशन
पथ को,
जिस पर चलते हुए
मिल जाते हैं
झुण्ड जुगनुओं के,
सजने लगाती है
दीप मालाएं,
और
कईं-कईं सूरज
उगने लगते हैं !
'स्व- चिंतन' की चिंगारी से
अंधेरों को
भष्म होना ही होता है !!
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!! दिल से !!
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सुन रहा हूँ
मौन रह कर
आस-पास पसरी
खामोशियों को....
खामोशियों का
मुखर हो जाना
'गर बन सकता है
मेरी चुप्पी का कारण,
तो किसी दिन
सुन रहा हूँ
मौन रह कर
आस-पास पसरी
खामोशियों को....
खामोशियों का
मुखर हो जाना
'गर बन सकता है
मेरी चुप्पी का कारण,
तो किसी दिन
मैं
मुखर भी हो सकूंगा
इन्हीं खामोशियों
के कारण.........!!
मुखर भी हो सकूंगा
इन्हीं खामोशियों
के कारण.........!!
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मंगलवार, 13 नवंबर 2012
मंगलवार, 30 अक्टूबर 2012
मंगलवार, 23 अक्टूबर 2012
बुधवार, 17 अक्टूबर 2012
!! 'देश हित' स्वतन्त्र चिंतन मांग रहा है !!
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.......आज
आवश्यकता इस बात की है कि 'पुरानी घाघ पार्टियों' का जो 'चश्मा' हमने लगा
रखा है,उनकी 'बेईमानियों' को देखते हुए उसे उतार फेंक देना चाहिए,और इस देश
के लिए जो नयी 'बयार',जीवन रक्षक के रूप में बह रही है,उसे अपनाया जाना
चाहिए !
......देश को खोखला कर के रख देने वाले राजनैतिक दलों का आखिर पल्लू
क्यूँ थाम कर रखा जाए ? क्या 'देश हित' से बड़ा किसी भी राजनितिक पार्टी का
हित हो सकता है,या कि समझा जाना चाहिए ? पार्टीयों के पहने हुए 'चश्मों' ने इस देश का बहुत नुक्सान किया है,क्योंकि उन
पार्टियों की हर 'काली करतूत' को हम माफ़ करके अपनी 'पार्टी-भक्ति' ही
दिखाते रहे हैं !
...... 'देश हित' स्वतन्त्र चिंतन मांग रहा है.
......यही सही वक़्त है
कि विवेक जागृत कर सोचा जाए कि अब तक जिन पार्टियों के हम अंध भक्त बन कर
'वोट बेंक' बने रहे,आखिर उन पार्टियों ने इस देश को कहाँ पहुंचाया ? इस देश
के आम इंसान के लिए उसने क्या किया ?? 'लोकतंत्र' पर 'बेईमान तंत्र' का लेबल
किसने मज़बूती से चस्पा कर दिया ???
......पार्टी विशेष की अंधभक्ति और चापलूसी से
ऊपर उठ कर देशहित को सर्वोपरि रखने वाला ही इस देश के प्रति अपने फ़र्ज़ को
निभा पायेगा............!!!!!
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गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012
आखिर कौन है ?!
!!!!!!!!!! आखिर कौन है ?! !!!!!!!!!!
ये जो
हर हाल में
"मौन" है !
आखिर कौन है ?!
आखिर कौन है ?!
'राजा' है
या है 'मोहरा' ?
सच पे है
घना कोहरा !
बेईमानो की यहाँ
भीड़ बहुत है,
दलालों के यहाँ
'नीड़' बहुत है !
बिगड़ गई है
दशा,देश की,
टूटी मर्यादा,
'श्वेत' भेष की !
व्यवस्था सारी
चौपट है,
कुर्सियों पे
चढ़े 'नट' है !
घपलों का
ना और-छोर है,
'चोर' कोई,
कोई 'महा चोर' है !
''रोबोट'' है,या
उसका 'क्लोन' है ?
ये जो
हर हाल में
"मौन" है !
आखिर कौन है ?!
आखिर कौन है ?!
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शनिवार, 6 अक्टूबर 2012
शुक्रवार, 21 सितंबर 2012
'भारत' बंद या 'दिमाग' बंद ?
.....'भारत
बंद' अब एक मजाक से ज्यादा कुछ नहीं रहा.जो भी संगठन या पार्टी, जब भी
चाहे भारत बंद की घोषणा कर देती है,जबकि इसका परिणाम शून्य ही रहता
है.हाल-फिलहाल में भारत बंद इतनी बार हो चुका है कि अब 'बंद' अपनी
प्रासंगिकता भी खो चुका है.कोई बंद तभी सार्थक होता है,जबकि उससे जुड़े लोग
अपने मन से इसमें शरीक होते हो.आज सच्चाई ये है कि जिन संगठनों या
पार्टियों की तरफ से 'भारत बंद' का आयोजन किया जाता है,केवल उनसे जुड़े लोग
ही इस तरह के आयोजनों में जुटते हैं,और 'अवाम' जबरदस्ती या डर से ही इस तरह
के आयोजनों को स्वीकार करता है.
......वैसे
भी सरकार या नीति निर्माताओं के कुकर्मों की सज़ा देश के अवाम को दिये जाने
को कैसे जायज़ ठहराया जा सकता है ? 'भारत बंद' से आखिर सरकार या नीति
निर्माताओं पर क्या फर्क पड़ता है? फर्क पड़ता है तो उस आम इंसान पर ही जो
सरकार की कुनीतियों और बंद करवाने वालों के बीच पिसता है.बंद से ज्यादा से
ज्यादा ये होता है कि संगठनो या पार्टियों के 'नेताओं' को अपनी राजनीति
चमकाने का मौक़ा मिलता है और 'टी.वी-अखबारों' में आने की भूख शांत होती
है--इससे ज्यादा कुछ भी नहीं !
......याद
कीजिए,हाल-फिलहाल में बंद हुए 'भारत' से इस देश के अवाम को क्या हासिल
हुआ? क्या सरकार के घोटाले रुके ? महंगाई रुकी ? सरकारी दफ्तरों में
भ्रष्टाचार रुका ? निश्चित रूप से इन सभी सवालों का ज़वाब 'ना' में ही
होगा.बस इस तरह के बंद से इस देश का आम इंसान ज़रूर परेशान हुआ है.सरकार की
जनविरोधी नीतियों का समर्थन किसी भी कीमत पर नहीं किया जाना चाहिए,लेकिन
उसका विरोध भी इस तरह से होना चाहिए कि जन विरोधी सरकार और उसके निति
निर्माता परेशान हो और वे अवाम के हित में कार्य करने को मजबूर हो.'देश
बंद' करने की बजाय राज करने वालों और उसके निति निर्माताओं का
चलना,फिरना,उठाना,बैठना और सांस तक लेना मुश्किल कर देना चाहिए,तभी अवाम के
हित में कुछ हो सकता है.भारत बंद में,कथित रूप से जबकि करोड़ों लोग शामिल
होते हैं (जैसा की बंद करवाने वाले दावा करते हैं),तो फिर निश्चित रूप से
'कुछ लाख' लोगों को लेकर देश पर राज करने वालों और उनके निति निर्माताओं को
घेरने का काम हरगिज़ कठिन नहीं होना चाहिए !आखिर 'अपराध' वे कर रहे हैं तो
'सज़ा' भी उन्हीं को मिलनी चाहिए,ना कि अवाम को.
......दशकों
बाद इस देश में एक सच्चा जन-आन्दोलन 'अन्ना' के नेतृत्व में शुरू हुआ
था,जिसे अगर विभिन्न संगठनो, और राजनैतिक दलों का 'सच्चा' समर्थन मिला होता
तो इस देश के आम इंसान की तकदीर संवर सकती थी ! लेकिन चूँकि उस आन्दोलन से
'स्वार्थ' नहीं सध रहा था,सो 'देश भक्ति' का चोला पहने घूम रहे लोगों ने
उस आन्दोलन को बेमौत मारने में ही अपनी शक्ति लगादी थी.अब जबकि एक
अच्छा,सच्चा और वास्तविक 'जन-आन्दोलन' 'सुप्त' अवस्था को प्राप्त हो चुका
है,और जिसे भ्रष्ट-बेईमान,देश खाऊ लोग 'मृत' मान के 'मूंछों पर ताव' देकर
घूम रहे हैं,और 'देश हित' के लिए विभिन्न 'नौटंकियों' में लगे हैं,वस्तुतः
वे अवाम की कीमत पर सिर्फ अपना 'स्वार्थ' साध रहे हैं !
.....सरकारों
और राजनितिक दलों-संगठनो के बीच पिसते भारत देश के अवाम को, भारत बंद करके
कृपया और परेशान मत कीजिए.भारत बंद करने की बजाय अपने 'बंद दिमाग' को
खोलिए,इस देश के आम इंसान के बारे में सोचिये और भ्रष्ट-बेईमान सरकारों और
उनके उतने ही भ्रष्ट-बेईमान नीति निर्माताओं को देश के प्रति,अवाम के
प्रति 'पाबन्द' कीजिए,तभी कोई सार्थक परिणाम निकल पायेगा.
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