शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

!! फुटपाथ पर कराहता इन्साफ !!

      !! फुटपाथ पर कराहता इन्साफ !!
      पता नहीं लोग फुटपाथों पर क्यूँ सोते हैं ! क्या फुटपाथों पर सोने वालों को इतना भी पता नहीं कि फुटपाथ 'रईसजादों', 'बेवडों' के कारनामों के लिए बने हैं ! अरे भाई, मरने का इतना ही शौक है तो कोई अन्धेरा कुंआं ढूंढ लो, किसी मल्टी स्टोरी बिल्डिंग से छलांग लगा लो ! यूँ फुटपाथों पर सो कर बेमौत मारे जाने का 'गुनाह' करके क्यूँ किसी सेलेब्रिटी का, नशे में चूर रईस का कोर्ट-कचहरियों में समय खराब करते हो !
      मैं तो कहता हूँ जो गरीब, मुम्बई में बेकरी के बाहर हीरो की गाडी से कुचल कर मारेजाने का 'गुनाहगार' है,उसे माननीय अदालत के माध्यम से नोटिस भेजा जाना चाहिए कि वो पुनः ज़मीन पर आ कर 'हीरो' से और 'माननीय कोर्ट' से उनका अमूल्य समय खराब करने के लिए माफ़ी मांगे, क्योंकि उस भोले मृतक के अलावा सभी जानते थे कि कोर्ट किसी भी रईसजादे का कभी भी कुछ भी बिगाड़ नहीं सकती ! ऐसे में 'माननीय कोर्ट' और 'सम्माननीय हीरोजी' का समय खराब करने की जुर्ररत कैसे की उस 'गरीब' ने !वैसे भी जब आरोपी कोई 'हीरो' हो तो उसे कोई दंड कैसे दिया जा सकता है ? अरे भाई उस पर फिल्मों में करोड़ों-अरबों रुपये लगे होते हैं, क्या एक 'अदद गरीब' की मौत पर किसी का करोड़ों का नुकसान जायज़ है ? और फिर भारत की उस 'मनोरंजन प्रिय' जनता का क्या होगा, जिनका हाजमा इन हीरो की झूठी हिरोगिरी देखे बिना बिगड़ा रहता है ? बेकरी के बाहर हीरो की गाडी से कुचल कर बेमौत मारे जाने वाले ए 'गुनहगार गरीब', ऊपर से इधर निचे देख ज़रा, तेरी मौत पर जितनों ने मातम ना मनाया होगा ना, आज उससे कईं गुना ज्यादा 'पत्थर दिल तमाशबीनों' ने अपने हीरो की बाइज्जत रिहाई पर ढोल-नगाड़ों के साथ जश्न मनाया है ! ले,अब तू करले, क्या कर लेगा?
      बेकरी के सामने हीरो की गाडी से कुचल कर बेमौत मारे जाने वाले ए 'गरीब गुनहगार', इन तेरह सालों में तेरी रूह को तो ऊपर वाले ने ज़रूर सुकून बख्श दिया होगा, किन्तु निचे हीरो और उसके मुरीदों की आत्मा को शान्ति मिलने में पुरे तेरह बरस लग गए तेरे कारण ! अब बोल तुजे क्या सज़ा दी जाए ? मैं तो कहता हूँ हीरो को अब कोई ऐसा ताक़तवर 'पेरवीकार' रखना चाहिए जो 'माननीय कोर्ट' के माध्यम से, ज़न्नत में आराम फरमा रहे, बेकरी के सामने फुटपाथ पर सोकर बेमौत मारे जाने का 'गुनाह' करने वाले उस गरीब को पुनः निचे बुला कर उस पर मुकदमा चलाए !
      बेकरी के सामने फुटपाथ पर सो कर 'खाए-पिए' हीरो की गाडी से कुचल कर मारे जाने का गुनाह करने वाले ए गरीब, तेरा गुनाह तो साबित हो गया......कि तू फूटपाथ पर सोया ही क्यूँ ! लेकिन तुझे किसने कुचल दिया, 'इन्साफ के देवता' ये नहीं बता पाए ! हमारे हीरो को इन्साफ मिल गया.....तुझे मिला ना मिला, क्या फर्क पड़ता है ! हमारी फिल्मों में इन्साफ हीरो ही करता है,यहाँ भी इन्साफ हीरो को मिल गया तो क्या हो गया ! आखिर इन्साफ किसी बेकरी के बाहर फुटपाथ पर सो कर 'रईसजादों-बेवडों' की गाडी से कुचल कर मारे जाने का 'गुनाह' करने वाले 'गरीबों' के लिए था ही कब????? 
'भांड-भक्तों',आज सोना मत........आज जश्न की रात है !!!
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सोमवार, 7 दिसंबर 2015

!! अच्छे दिनों का सरकारी चुटुकला !!

अच्छे दिनों का सरकारी चुटुकला
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 मानाकेंद्र सरकार ने अपने पचास लाख कर्मचारियों के लिए 'एडवेंचर ट्रिप' का ऐलान किया है! इसका कारण ये बताया गया है कि इससे कर्मचारियों का तनाव घटेगा और टीम भावना का विकास होगा तथा चुनौतियों को स्वीकारने की क्षमता बढ़ेगी !
    अब देखिये,ये चुटुकला नहीं तो और क्या है ! एक तो केंद्र सरकार के कर्मचारी,यानी वैसे ही पाँचों उंगलिया घी में, और अफसरों के तो सिर भी कडाही में ! सरकारी कर्मचारी को तनाव था ही कब? तनाव तो जितना भी है, जो भी है, जैसा भी है, भोलीभाली अवाम के हिस्से में ही है ! सरकारी कर्मचारियों ने तो सारा का सारा तनाव अवाम को दे रखा है, दफ्तरों के चक्कर लगाने और जेबें गर्म करने के लिए! अब जबकि तनाव है ही नहीं तो कम क्या करेंगे !
    सरकारी कर्मचारियों में टीम भावना का विकास करना इस ‘एडवेंचर’ की दूसरी महत्वपूर्ण बात है ! अरे भाई, सरकारी कर्मचारियों के जैसी ‘टीम भावना’ और कहाँ मिलेगी? निचे से लेकर ऊपर तक जैसे मिलबांट कर खाते हैं, कोई दुसरा उदाहरण तो बता दो ऐसा ! जब ऐसी टीम भावना में कोई कसर ही नहीं है, तो उसका विकास क्या ख़ाक करोगे !
    अब रही तीसरी बात. ‘चुनौती’ स्वीकार करने कि क्षमता बढ़ाना ! चुनौती तो वे अवाम के आम आदमी को देते ही रहते हैं ! ‘जब तक तू टेबल के निचे से करारे नोट नहीं सरकाएगा, तेरा काम नहीं होगा! जा तेरी हो जो करले !’ अब इससे ज्यादा चुनौती की क्षमता उनसे और क्या चाहती है केंद्र सरकार !
    कुल मिला कर ऐसे ‘सरकारी चुटुकले’ अच्छे दिनों की संभावनाओं को पुख्ता कर रहे हैं ! ‘अच्छे दिन’ सरकार, सरकारी कर्मचारियों और धन्ना सेठों के आ जाएँ बस ! अवाम का क्या है ! वो तो सदैव ही सरकारों द्वारा दिखाए गए झूठे सपनों पर ही जीती आ रही है ! अच्छे दिनों का एक सपना और सही!! सपनों पर साठ साल गुज़ार दिए तो पांच साल और कौनसी बड़ी बात है!  

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शनिवार, 4 जुलाई 2015

!! दूध का दूध पानी का पानी !!

देख मलाई-रबड़ी जब मुंह में आये पानी,
कैसे करे कोई,दूध का दूध पानी का पानी!
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    'दूध का दूध पानी का पानी' मुहावरा केवल विपक्ष के लिए बना है.जिसके पक्ष में कुर्सी आई,उसके लिए इस मुहावरे का कोई अर्थ नहीं.बल्कि तब तो ये मुहावरा पक्ष के लिए 'अनर्थ' बन जाता है.इस लिए पक्ष वाले इस मुहावरे से कन्नी काटते हैं और विपक्ष वाले इस मुहावरे को पानी पी पी कर दिन में सौ बार दोहराते है!
   भाजपा जब संसद में और विधान सभाओं में विपक्ष में बैठा करती थी,तब कांग्रेस के काले कारनामे पर पहली प्रतिक्रिया के रूप में भाजपा के मुंह से 'दूध का दूध पानी का पानी' ही निकलता था!मतलब कि कोंग्रेसियों पर आरोप लगा नहीं कि जांच बिठा दो ताकि 'दूध का ढूध पानी का पानी' हो जाए.लेकिन उस वक़्त 'चुल्लू भर पानी' के मुहावरे को प्राप्त हो चुकी कॉंग्रेस तब भी 'दूध का दूध पानी का पानी' करवाने को हरगिज़ तैयार नहीं होती थी! इधर भाजपा 'पानी पी पी कर' दिन भर 'दूध का दूध पानी का पानी' वाला मुहावरा ठोकती रहती थी! दरसल उस वक़्त कॉंग्रेस के लिए 'दूध का दूध पानी का पानी' मुहावरा अनर्थकारी था सो उसने उसको पानी के साथ निगल कर भुला ही दिया था.
    चुनाव हुए. हालात बदले. मतदाताओं ने कॉंग्रेस को चुनावों में पानी पिला कर 'शर्म से पानी पानी' कर दिया और भाजपा को सत्ता सौंप दी.दूध का दूध पानी का पानी वाला मुहावरा भुला बैठी कॉंग्रेस जब विपक्ष में आ बैठी तो उसके रणबांकुरों ने पुनः झांड-पोंछ कर दूध का दूध पानी का पानी वाला मुहावरा विपक्ष की टेबल की दराज़ मेसे निकाला और पानी पी पी कर भाजपाईयों के सामने रटने लगे!अब बारी थी भाजपाईयों द्वारा इस मुहावरे को भूल जाने की,क्यूँ कि सत्ता के लिए ये मुहावरा अनर्थकारी जो था! सुषमा-वसुंधरा,मूंडे-तावडे, आदि इत्यादि के लिए कॉंग्रेसी 'दूध का दूध पानी का पानी' वाला राग अलापते रहे,लेकिन भाजपा इस मुहावरे को बिना पानी का घूंट पिए हलक से उदरस्थ करती रही! सत्ता की चौखट पर 'दूध का दूध पानी का पानी' मुहावरा फ़ैल हो गया! होना ही था! बात सीधी सी है. जब सामने मलाई रबड़ी खाने को पड़ी हो तो ऐसे में कोई क्यूँ ये याद रखे कि 'दूध का दूध पानी का पानी' किया जाए?मलाई-रबड़ी उड़ाने के मौके बड़ी मुश्किल से मिलते हैं, ऐसे में सिर्फ दूध को याद रखना मुफीद होता है! आखिर मलाई-रबड़ी दूध से ही बनती है! 'पानी' तो चुल्लू भर या शर्म से पानी पानी वाली स्थिति में हिस्से आना ही है,फिर भला सत्तासुख भोगते हुए क्यूँकर इस पर ध्यान दिया जाए!


   वैसे भी अब तक की कारस्तानियों से ये पक्का हो चुका है कि सत्ता में बैठे लोग कभी भी 'दूध का दूध पानी का पानी' कर ही नहीं सकते! वे सिर्फ दूध की मलाई,रबड़ी और कलाकंद खा कर हज़म ही कर सकते हैं! 'दूध का दूध पानी का पानी' करने का काम तो अवाम के हिस्से में है, और वो वक़्त आने पर ज़रूर करती है! 'दूध,मलाई,रबड़ी और कलाकंद' खाने वालों को ये ज़रूर याद रखना चाहिए!
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!! मारक मोदी-तारक मोदी !!

!! मारक मोदी-तारक मोदी !!
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    आजकल देश में 'मोदी' का बोलबाला है!एक मोदी देश को अच्छे दिनों की और लेजा रहा है तो एक मोदी देश में भूचाल ला रहा है!विदेश में बैठा मोदी ट्विटर नाम का लट्ठ लेकर हिन्दुस्तान के तथाकथित जनसेवकों के पीछे ऐसे पडा है कि राज महलों के सुख भोगते भोगते उन्हें दिन में तारे नजर आने लगे हैं!ये विदेश वाला मोदी 'मारक' के रोल में है,और हिन्दुस्तान में पब्लिक को गच्चा देने के माहिर नेताओं को ये विदेश वाला मोदी अब ऐसा गच्चा दे रहा है कि साँसे हलक में अटक गयी है!
   केंद्र सरकार का एक साल बड़ी शान्ति से,दागरहित गुजरा,और उसका जश्न अभी शुरू ही हुआ था कि विदेश में बैठे 'मारक' मोदी ने इनका बेंड बजाना शुरू कर दिया!इधर महाराष्ट्र में सत्ता का नया नया स्वाद चख रहे 'मूंडे-तावडे' आदि इत्यादि अति उत्साह में घोटालों के लपेटे में आ गए!जैसे 'मौनीबाबा' की कॉंग्रेसी सरकार के घोटाले एक के बाद एक खुलते गए और उसके अंतिम संस्कार के बाद ही बंद हुए वैसे ही,अभी भाजपा के राज में एक के बाद एक घोटाले और विदेशी 'मारकमोदी' के 'ट्वितीर' ने शांत समंदर को सुनामी के हवाले कर दिया है!
    इधर प्रधानमन्त्री 'तारकमोदी','मौनमोहन' की राह चल पड़े हैं!अपने चमकते-दमकते सितारों पर विदेशी 'मारकमोदी' के 'ट्वितीरों' पर उन्होंने चुप्पी साध ली है!इस चुप्पी को क्या समझा जाए? दुःख?! गुस्सा!!?? याकि डूबने वाले को पूरा डूब जाने तक चुपचाप देखने की कला!!!???
बहरहाल,विदेश में बैठा 'मारकमोदी',चाची-भतीजे,जीजी-जीजा आदि आदि को भी लपेटे में ले चुका है!अब आगे और किसका नंबर आने वाला है,ये ट्विटर महाराज ही बता सकते हैं!सत्ता में बैठ कर मलाई खाने वालों के लिए 'मारकमोदी' चुल्लू भर पानी का इंतजाम किये जा रहा है!
    इधर एक बात समझ नहीं आ रही,कि 'मौनीबाबा' के राज में कॉंग्रेस के काले कारनामों की जांच करवा कर दूध का दूध पानी का पानी करने की मांग करने वाले वर्तमान के सत्ताधीश,'मारकमोदी' के चेलों की जांच करवा दूध का दूध पानी का पानी क्यूँ नहीं कर लेते?क्या इसलिए तो नहीं कि ये दिन दूध की मलाई-रबड़ी खाने के हैं और ऐसेमें  उसमे से पानी को अलग करने का ख्याल नहीं आ रहा?

     जो भी हो,मजा तो तब आये जबकि दो-चार और 'मारकमोदी' विदेश में या देश में बैठे हों और सफ़ेदपाशों के काले कारनामें उजागर करते रहे!आखिर स्वच्छ भारत अभियान के लिए ये भी कोई कम कारगर नहीं है!
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मंगलवार, 30 जून 2015

!!पगडण्डी!!

!!पगडण्डी!!
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......क्या आपको गाँव की पगडण्डी याद है?अरे वही जो गाँव में कहीं से भी शुरू हो कर कहीं भी चली जाती थी! सड़कें थी ही कहां! कच्चे रस्ते दूर तलक चले जाते थे.साथ साथ पगडण्डीयां भी चलती रहती थी! गाँव में सुबह सवेरे उठ कर जंगल जाना हो या फिर पनघट पर या कि माता जी के मंदिर जाना हो या किसी खुले मैदान में,बस पगडण्डीयां ही सहारा थी.
......इन पगडंडियों पर कितना अपनत्व पलता था! कभी कभार किसी पगडण्डी पर कोई काँटा गिर जाता या कि बड़ा सा पत्थर, जिस भी राहगीर को पहले दिख जाता वो उसे हटाये बिना आगे नहीं बढ़ता! पीछे आने वाले राहगीर की ये चिंता ये ख्याल उस पगडण्डी पर चलने वालों की विशेषता थी! धूल से सनी उजली पगडंडियों के जमाने में उस पर चलने वाले पथिकों के दिल भी उजले हुआ करते थे! आज की सरकारी सड़कें काली कलूटी, जिस पर फुर्र से अपनी ही धुन में गुजर जाने वालों के दिल भी कमोबेश उसी सरकारी काली सड़क के रंग में रंग से गए हैं! इन सड़कों पर कौन आया, कौन गया, किसे याद रहता है! इन काली कलूटी सड़कों पर इंसान कहाँ हैं! इन पर तो सिर्फ वे मशीनें दौड़ती हैं, जिनके सीने में दिल नहीं है. ये मशीने कहाँ पहचानती है इंसानों को! इंसान हो या जानवर इन्हें उनसे कहाँ बात करना आता है! कहाँ उनके साथ चलना, सम्बन्ध बनाना आता है! रिश्ते की गर्माहट उनमें कहाँ! ये तो बस कुचल सकती हैं उनको! सडकें ले जाती है जरुर हमें, लेकिन उस मुकाम पर नहीं पहुंचाती, जहां इंसान,इंसानियत,अपनापन आदि मिले! पगडण्डी ले जाती हैं वहां, जहां इंसान,इंसानियत और अपनापन है! पगडंडियों का कहाँ मुकाबला कर पाती है सड़कें!
......पगडण्डी पर बतियाते हुए पैदल चलते चलते कब कितना रस्ता कट जाता था, किसी को पता ही नहीं चलता! पगडंडियों के आस पास की प्रकृति से राहगीर का सहज संवाद चलता रहता.कंकड़,पत्थर,कांटें,कीड़े-मकोड़े सभी साथ साथ चलते! ना पीछे रहने का गम था ना ही आगे निकल जाने की आपाधापी! आसपास आते जाते हर राहगीर से बातचीत का सिलसिला निकल पड़ता था, जो किसी निकट-दूर के रिश्तेदार से पहचान निकलने तक जा पहुंचता था! इन्हीं पगडंडियों पर कईं सम्बन्ध-रिश्तेदारियाँ भी बन जाती! सही मायने में ये पगडण्डीयां दिल से निकल कर दिल तक पहुंचा करती थी! पगडंडियों का हमराह बना इंसान कब अपने मुकाम पहुँच जाता उसे भी पता नहीं चलता!
......आज कहाँ है पगडण्डीयाँ! कोलतार-सीमेंट की सड़कें निगल गयी इन पगडंडियों को बिलकुल वैसे ही,जैसे स्वार्थ ने इंसानियत को निगल लिया! पगडंडियों पर चलता इंसान बचा हुआ था, उसकी इंसानियत जिंदा थी, उसमें जमीर था, अपनापन था, मुहब्बत थी! पगडंडियाँ जिंदा रखे हुए थी इंसान को! आज की पीढ़ी को पगडण्डी के बारे में मालूम ही कहाँ! हमने भी कब बताया उनको! जरुरत ही नहीं समझी कभी कि इंसान से सरोकार रखने वाली पगडंडी को कभी किस्से-कहानियों में ही सही,अपने बच्चों को बताएं! आखिर हमें सड़कों से ही फुर्सत कहाँ! सरपट भागती जिन्दगी में सड़कें ही तो हो सकती है.....पगडण्डी कहाँ से आए! लेकिन रखना चाहिए,उस पीढ़ी को अपनी बातों किस्सों-कहानियों में पगडण्डी को जरूर रखना चाहिए, जिस पीढ़ी ने पगडंडियों के साथ बहुत सा वक्त गुजारा है. आप भी कभी कभार याद कर लिया कीजिये उन भूली बिसुरी पगडंडियों को........शायद आपको ये बहुत सी सुकून भरी पुरानी बातें भी याद दिला दें!
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रविवार, 28 जून 2015

!!फर्जी डिग्री-असली काम.....असली डिग्री-फर्जी काम !!

!!फर्जी डिग्री-असली काम.....असली डिग्री-फर्जी काम !!
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......आजकल फर्जी डिग्री खबरों में छाई हुई है.राज्य सरकारों के मंत्रियों से लेकर केंद्र सरकार के मंत्री तक पर फर्जी डिग्री का फर्जीवाड़ा चिपक गया है.दिल्ली के तो एक फर्जी डिग्री वाले असली मिनिस्टर जेल के हवा-पानी-खाने का लुत्फ उठा ही रहे हैं!अब देखना तो ये है कि फर्जी डिग्री के बूते असली मलाई खा रहे कितने भाई-बहन लोगों का पुलिस कस्टडी में मक्खन निकलता है!
......वैसे एक बात दिलचस्प है.फर्जी डिग्री के बूते असली मलाई खाने का फर्जी काम करने वाले आखिर अलग काम क्या करते है?वे वही काम तो करते हैं जो काम असली डिग्री लेकर असली मलाई खाने वाले लोग फर्जी तरीके से करते हैं! अब आप सोचिये  बड़ी बड़ी असली डिग्री लेकर बड़े लोग क्या कम फर्जीवाड़ा करते हैं?घपले-घोटाले करने वाले और देश को चुना लगाने वाले बड़े लोग क्या बिना डिग्री वाले हैं? एक से एक डिग्री लेकर बड़े पदों पर बैठे बड़े लोग असली डिग्री की आड़ में कितने फर्जी काम कर वारे-न्यारे करते हैं,क्या ये किसी से छुपा है?
......इधर महाराष्ट्र के एक धाकड़ नेता के कईं ठिकानों पर छापे पड़े हैं और वर्षों की उनकी और उनके निकट सम्बन्धियों की काली करतूतें सामने आने की पूरी संभावना है! पंकजा मुंड़े भी लपेटे में आ सकती है.ललित मोदी के जाल में भी कईं बड़े बड़े दिग्गज उलझ रहे हैं!वर्तमान और भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों के बेटों की कम्पनियों में फर्जीवाड़े के किस्से भी खूब हवा में है! ऐसे में कुल मिला कर दृश्य ये ही बन रहा है कि फर्जी डिग्री लेकर गोरखधंधा करने वाले जितने हैं,असली डिग्री लेकर फर्जीवाड़ा करने वाले उससे कहीं अधिक है! और कमाल की बात तो ये हैं कि असली डिग्री लेकर फर्जीवाड़ा करने वाले बहुत ऊँचे ओहदों पर बैठे हैं और रसूखदार है.
......राजनीति का फायदा यही है कि यहाँ किसी भी ओहदे के लिए किसी भी डिग्री की जरुरत नहीं पड़ती.एक अंगूठा छाप 'जनसेवक' भी आई.ए.एस.-आई.पी.एस. को आदेश दे सकता है इंजीनियरों-डाक्टरों की फौज को लताड़ सकता है और देश से अपनी 'जै' बुलवा सकता है! तो फिर उन्हें डिग्री की जरुरत आखिर पड़ी क्यूँ? शायद इसलिए कि रुतबे में "पांच चाँद" लग जाए! चार चाँद तो वैसे ही,सत्ता में ऊँची कुर्सी पर बैठते ही लग ही जाते है! शायद ये पांचवें चाँद की चाहत ही फर्जी डिग्री का मोह पैदा करती है!
......बात तो तब है जबकि फर्जी डिग्री लेकर मौज कर रहे लोगों का भांडा फोड़ने के साथ साथ असली डिग्री लेकर तमाम फर्जी काम करने वाले बड़े पदों पर आसीन बड़े लोगों का भी भांडा फूटे और जेल की हवा-पानी-खाना उनके हिस्से में भी आये! वरना,फर्जी डिग्री के दो-चार अपराधियों की बलि लेकर असली डिग्री के बूते फर्जी काम करने वालों से मुंह फेरकर बैठ जाना तो वही बात होगी कि 'हाथी के दांत..... खाने के अलग दिखाने के अलग!' वैसे अब जबकि फर्जी डिग्री का मामला गरम है तो सरकार को लगे हाथ पुरे देश में इस बात का भी पता लगाने की गंभीर कोशिश शुरू कर देनी चाहिए कि असली डिग्री लेकर ऊँचे ओहदों पर बैठ कर कितने लोग फर्जीवाड़ा कर जम कर "मलाई जीम" रहे हैं! अगर किसी दिन इस बात का खुलासा हो गया तो यकीन मानिए इस देश में फर्जी डिग्री का गोरखधंधा स्वतः ही बिलकुल बंद हो जाएगा और लोग असली डिग्री के लिए जी-जान लड़ा देंगे.......आखिर ज्यादा "मलाई जीमने" का जो सवाल है!!  
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रविवार, 11 मई 2014

!!!!! "हाय मॉम,हैप्पी मदर्स डे" !!!!!

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!!!!! "हाय मॉम,हैप्पी मदर्स डे" !!!!!
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हाय मॉम,
आज खुश हो जाओ
आज आपका दिन है !
''अच्छा''!
हाँ 'मॉम',
आज 'मदर्स डे' है !!
''अच्छा''!
हां 'मॉम' !
बोलो 'मॉम'
आपको क्या चाहिए......,
मोबाईल भिजवा दूँ.....
सलवार सूट.......
या कि साडी ठीक रहेगी....!
''अरे नहीं-नहीं बेटा.....''
अरे 'मॉम' 
आज तो कुछ ना कुछ 'गिफ्ट' दूंगा ही....!
अच्छा तो 
आप कहो तो 
ब्रांडेड घडी......
ब्रांडेड चप्पल.........
ब्रेसलेट......
पर्स.......
का पैकेज ही भिजवा देता हूँ.....!
''अरे नहीं-नहीं बेटा.....''
अरे आज तो 'मदर्स डे',
आज तो आपका दिन है.....
आज तो आप जो भी मांगो 
मैं देकर ही रहूंगा.......!!
''अच्छा बेटा,
थोड़ा समय निकाल कर 
घर आ जाओ,
मुझे और तुम्हारे पापा को 
तुम्हारा थोड़ा सा समय चाहिए.....''!
''ओह मॉम......
सॉरी......
ये क्या मांग लिया आपने......????
सॉरी मॉम..... सॉरी.....!!!!!!
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!!!!!!!!!!! हेप्पी मदर्स डे !!!!!!!!!!!
********* अशोक पुनमिया **********
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