शनिवार, 15 अप्रैल 2017

जनकल्याणकारी सरकारें आखिर क्यों 'दारु' पिलाने पर आमादा है?

जनकल्याणकारी सरकारें आखिर क्यों 'दारु' पिलाने पर आमादा है?
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      एक तरफ न्यायालय हाईवे पर नशे के चलते होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने के लिए जनहित में निर्णय दे रहे हैं तो दूसरी तरफ राज्य सरकारें हाईवे के नाम बदल कर दारु की बिक्री को यथावत रखने की तरकीबें लगा रही है!
       राजस्थान में दारु की कम बिक्री पर कुछ समय पहले आबकारी विभाग के अफसरों की सुविधाएं छीन कर सरकार ने दण्डित किया था,अब स्टेट हाईवे का नाम बदलने का खेल चल रहा है!मतलब सरकार का काम दारु के बिना नहीं चल सकता!
      गाँव-गाँव में बच्चे-महिलाएं-पुरुष दारु की दुकानों के खिलाफ आंदोलित है,जबकि सरकार राजस्व के लालच में जनहित को अनदेखा कर दारु को बढ़ावा देने में लगी है! दारु की बिक्री से प्राप्त राजस्व से कईं गुना ज्यादा धन भ्रष्ट व्यवस्था द्वारा उदरस्थ कर लिया जाता है,अगर वो बचा लिया जाए तो सरकारों को विनाशकारी निर्णय लेने ही ना पड़े!
      एक नशेड़ी से रुपये कमाने की खातिर 3-4 जिन्दगियों को बर्बाद करने और एक घर को उजाड़ने की सरकारी नीति घोर निंदनीय है,इसके खिलाफ सशक्त जन आंदोलन की सख्त जरुरत है।