गुरुवार, 6 अक्तूबर 2016

!! देशभक्ति का खुमार !!

 !! देशभक्ति का खुमार !! 
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देशभक्ति का हमारा सारा खुमार,
फुटपाथिया दुकानों पर सजे,
चमचमाते,सस्ते किन्तु घटिया 
"चाईनीज" माल को देखते ही 
उतर जाता है ! 

कुम्भकार द्वारा 
मेहनत से बनाए गए 
सुन्दर,पारंपारिक दीयों और 
लाईट की देशी झालरों को देख कर 
उबकाई आती है,
क्योंकि हमारी जीभ तो 
"चाईनीज "माल देख कर ही 
लपलपाती है !

     कड़वा है,
किन्तु क्या करें...सच यही है !!

   इस सच को स्वीकारे बिना 
और फिर इसे झूठ में बदले बिना 
देशभक्ति सही मुकाम नहीं पा सकती।

इस दिवाली जब 
आपके-हमारे घरों में 
दीपक जल रहे होंगे,

सरहद पर 
आपके-हमारे लिए 
शहादत देने वाले किसी 
वीर शहीद के घर 
मातम पसरा होगा,
घनघोर अन्धेरा होगा !

उस वीर शहीद को 
लगी गोलियों में शायद 
कुछ धन हमारा भी हो सकता है,
जो हमने 
विदेशी घटिया माल खरीद कर 
दुश्मन देश को दिया होगा !

    इस दिवाली 
किसी शहीद के घर की 
देहरी को देखलें तो शायद 
दिवाली के अर्थ भी समझ में आएं 
और देशभक्ति के मायने भी !!

!! जय हिन्द !!

शनिवार, 24 सितंबर 2016

!! शहादत की कीमत !!


शहादत की कीमत
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शहादत की कीमत
बहुत है
दो-चार लाख रुपये !


सरहद पर शहीद हुआ
वीर जवान आखिर
इस देश के 
किसी सेठ-साहूकार,
पूंजीपति,दबंग,
मंत्री-नेता-अफसर
या किसी और प्रजाति के
हरामखोर की औलाद
थोड़े ही था !


शहीद नहीं आया था
किसी बंगले,कोठी,महल से,
वो 
टाई,सूट,बूट पहन
कंधे उचका-उचका कर
बोलने वाली
पित्ज़ा-बर्गर वाली पीढ़ी का
प्रतिनिधि भी नहीं था !


शहीद तो आया था
खेत खलिहानों से,
पहाड़ों से,
देहातों से,
शहीद निकला था
टूटे झोंपड़े से,
पगडंडियों वाले
ऊबड़खाबड़ रास्ते से,
धूल से सने हालातों से,
रूखी-सूखी खाते,
फटे कपडे पहनते,
शिक्षा-साधनों को तरसते
माहोल से !


ऐसे शहीद के परिवार को
पैसों की क्या ज़रूरत ?


उसका परिवार
कर लेगा गुज़ारा
रूखी-सुखी खाकर,
अपने जवान बेटे-पति-पिता की
शहादत को याद करते हुए !


देश का पैसा बचा कर रखो
सेठों-साहूकारों,दबंगों
मंत्रियो-नेताओं-अफसरों
पूंजीपतियों-हरामखोरों 
और
उनकी औलादों के लिए!


देश का पैसा
शहीदों पर जाया मत करना,
देश के पैसों पर
सिर्फ हरामखोरों का हक़ है !!!
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मंगलवार, 30 अगस्त 2016

ओल्ड इज गोल्ड !

ओल्ड इज गोल्ड !





पुरानी चीजों को बड़ी हिकारत भरी नज़रों से देखा जाता है।साइकिलों,घोड़ा गाड़ियों,बैल गाड़ियों को आउट ऑफ डेट करार दिया जा चुका है,लेकिन मज़ेदार बात ये है कि जहां पर आधुनिक चीजें भी फ़ैल हो जाती है या ज़वाब दे जाती है,वहां फिर से पुरानी चीजों की सहज याद आती है,क्योंकि वहां वे ही उपयोगी साबित होती है।
    अभी हमारे यहां लगातार चार दिनों तक जम कर बारिश हुई।इंद्रदेव की कृपा 'कोप' में बदल गई।बाढ़ के हालात पैदा हो गए।बिजली गुल हुई तो ऐसी गुल हुई कि पुरे 30 घण्टों बाद आई! इस बीच मोबाइल-नेट सबकुछ धीरे-धीरे ठप्प जो गए।रात में एक तरफ मूसलाधार बारिश दूसरी तरफ घुप्प अन्धेरा! जो अपने घर पर इन्वर्टर लगा इतराते घूमते थे,जब पूरा मोहल्ला घुप्प अँधेरे में डूबा होता और वे अपने घर को इन्वर्टर के बल पर जगमग कर फुले नहीं समाते थे,30 घण्टों की बिजली गुल ने उनके इन्वर्टर के भी होश फाख्ता कर दिए!कुछ घण्टों पहले जो इन्वर्टर खिलखिलाकर हँस रहा था,वो दस-बारह घण्टे बाद ही मुँह लटकाये पड़ा था!
     ऐसे में याद आई तो "लालटेन" (लेंटर्न) की! मैंने घर के स्टोर में पड़ी 25-30 वर्ष पुरानी,जंग लगी लालटेन निकाली,जिसमें शायद 8-10 वर्ष पुरानी बाती भी लगी हुई थी,झाडी-पोंछी और मिट्टी का तेल भर दिया।दियासलाई की एक तीली ने लालटेन को घर का चिराग बना दिया!मेरे 10 वर्ष के बेटे ने जब ये अजूबा देखा तो बोल पड़ा-"पापा,आज कौनसी दीवाली है?" उसने अभी तक इस तरह के कंदील ही दीवाली पर देखे थे!
    आधुनिकता की चकाचौंध में कुछ तथाकथित गयीगुजरी, पुरानी,आउट ऑफ डेटेड घोषित हो चुकी चीजे भी समय आने पर अपनी उपयोगिता दिखा कर सबक दे दिया करती है कि इस दुनिया में कब किसकी ज़रूरत पड़ जाए कहा नहीं जा सकता!!

मंगलवार, 23 अगस्त 2016

!! जीवन तो है ही संघर्ष का नाम !!

जीवन तो है ही संघर्ष का नाम !
   
    'क्या आप परेशान है? बिमारी,आर्थिक तंगी, असफलता,घरेलू झगड़े,आपका पीछा नहीं छोड़ रहे?बेटा-बेटी आपकी आज्ञा के विरुद्ध काम करते हैं?पति-पत्नी में झगड़ा होता रहता है?भाई-बहनों से मनमुटाव है?आपसी संपत्ति का झगड़ा है?भाड़े के फ्लेट में रहते हैं? व्यवसाय में अपने दोस्तों-सम्बन्धियों से पीछे रह गए हैं?लड़का-लड़की बड़े हो गए और उनकी शादी नहीं हो रही है?उधारी अटक गई है?नौकरी कर रहे हैं?अगर आप भी इनमेसे किसी एक या अनेक समस्याओं से ग्रस्त हैं और उनका समाधान चाहते हैं तो हमसे सम्पर्क करें।'
     इस तरह के तमाम विज्ञापन हमारे सामने तकरीबन रोज ही आते रहते हैं,जिनमें कईं 'ज्ञानीजन' तरह तरह के उपाय भी इन समस्याओं के हमें सुझाते हैं।इतना ही नहीं,हमारे आसपास के कईं मिलने वाले भी इन समस्याओं को दूर करने के बहुत से अज़ीबोगरीब रास्ते दिखाते हैं,जिनकी कोई विश्वसनीयता ही नहीं होती! कमाल देखिये कि ऊपर बताई गई समस्याओं मेंसे एक या अनेक हम मेंसे हर एक के जीवन में अवश्य होती ही है।किसी के जीवन में एक,तो किसी के जीवन में अनेक समस्याओं का होना कोई नईं बात नहीं है।नयी बात तो तब होगी,जबकि इस संसार में कोई एक,जी हाँ कोई एक इंसान ऐसा मिल जाए जो कहे कि मुझे किसी तरह की कोई परेशानी नहीं है,कि मेरे पास हर तरह का सुख है।और वास्तव में ऐसा हो भी! क्या ये सम्भव है? क्या जिंदगी मेसे हर तरह के दुःख को निकाल कर सिर्फ सुखों को ही कायम रखा जा सकता है? 
     जी नहीं,ये कदापि संभव ही नहीं है।जीवन तो है ही संघर्ष का नाम,जिसमें तरह-तरह के दुःख, परेशानियां आती ही रहती है।हाँ इसकी मात्रा में अवश्य फर्क हो सकता है।कोई कम दुखी,कम परेशान हो सकता है तो कोई ज्यादा।इन दुखों से,इन परेशानियों से हम बाहर निकलने का,कम करने का प्रयास कर सकते हैं और हमें करना भी चाहिए,जो हम करते भी हैं,किन्तु इसके लिए हमें किसी के बहकावे में आकर गलत मार्ग का चयन कभी नहीं करना चाहिए।पैसे लुटाने से और अंधविश्वासों की राह का पथिक बनने से अगर दुःख-परेशानियां-समस्याएं कम या खत्म हो जाती तो पैसे वालों और अंधविश्वासों का गोरखधंधा चलाने वालों की ज़िन्दगी में कोई दुःख-परेशानी होती ही नहीं और वे दुनिया में सबसे सुखी लोग होते !लेकिन क्या ऐसा है ? ज़रा आप अपने आसपास नज़र घुमा कर देखिये,हक़ीक़त आपको पता चल जायेगी!
     तो फिर आखिर इन तमाम तरह की परेशानियों-समस्याओं-दुखों को दूर करने का तरीका क्या है? तरिका है! तरीका ये है कि अपने भगवान् को,अपने आराध्य को याद करते हुए स्वयं में आत्मविश्वास, सकारात्मक सोच पैदा की जाए,दुःख और सुख दोनों को ज़िन्दगी का अनिवार्य हिस्सा मान कर सहज स्वीकार किया जाए,खुद दुःख, परेशानियां, समस्याओं से मुकाबला करते हुए भी प्राणी मात्र के दुखों,परेशानियों,समस्याओं को बांटने की भावना रखी जाए तथा दुखों-परेशानियों-समस्याओं को भगाने,दूर करने,कम करने का तथा सुखों को बुलाने का निरंतर पुरुषार्थ करते हुए जीवन बिताया जाए !जी हां,इन उपायों के अलावा और कोई उपाय नहीं है ज़िन्दगी को आराम से जीने का !दुखों,परेशानियों,समस्याओं को भी जीवन का अनिवार्य हिस्सा मानकर ही इनकी पीड़ा को कम किया जा सकता।जिंदगी जीने के लिए हवा का होना ज़रूरी है,लेकिन क्या हवा के झोंकें के साथ उड़कर आने वाले और आँख में घुस जाने वाले कचरे को रोका जा सकता है?जीने के लिए पानी का होना ज़रूरी है,लेकिन क्या सौ प्रतिशत शुद्ध और क्रिस्टल क्लियर पानी की ही उम्मीद कभी पूरी हो सकती है?जीने के लिए खाना आवश्यक है,किन्तु क्या बिना मिट्टी/घासपूस/कचरे के अनाज पैदा किया जा सकता है? तो फिर ज़िन्दगी से सिर्फ सुखों की ही उम्मीद क्यों?
     ज़िन्दगी में कचरा,मिट्टी,घासपूस की तरह दुःख, परेशानियां,समस्याएं भी आती ही रहेगी,इन्हें दूर करते रहिये......फिर आएगी......फिर दूर कीजिए......फिर आएँगी......फिर दूर कीजिये ! ज़िन्दगी जीने का इससे बेहतर,सलीकेदार और सच्चा तरीका दुसरा है भी नहीं!
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गुरुवार, 4 अगस्त 2016

!! टूटी सड़क पर 'अच्छे दिनों' की बैलगाड़ी !!

टूटी सड़क पर 'अच्छे दिनों' की बैलगाड़ी ! 

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     पचास साल पुरानी सड़क,लगभग पैंसठ-सत्तर साल के,मोटा ऐनक चढ़ाये "बा'सा" ड्राईवर साहब, मूसलाधार बारिश और बाबा आदम के ज़माने की,बिना 'वाइपर' की बस,जिसमें हार्न के अलावा सबकुछ बजता है!और पैसेंजर फुल्ली भगवान् भरोसे !!ये हैं गाँवों की परिवहन व्यवस्था का कॉम्बिनेशन,जिसे झुठलाया नहीं जा सकता।
     लडखडाती और खड़खड़ाती बस में आप बैठ कर जब अपने 15-20 किलोमीटर दूर गंतव्य पर पहुँचते हैं तब तक आपकी हालात भी उसी बस की तरह हो जाती है,और आपकी बॉडी का एक-एक पार्ट बोलने लगता है! हो सकता है आप इस बस में बैठ कर किसी शादी समारोह में जा रहे हो,और संभव है कि आपको शादी वादी भूलकर बस से उतर कर पहले किसी ओर्थोपेडिक्स के पास अपनी कमर का इलाज़ करवाने जाना पड़े!
     बुलेट ट्रेन,मेट्रो ट्रेन,लोकल ट्रेन.ए सी ट्रेन,हवाई टेक्सी आदि-आदि.....तमाम बातें शहरों-महानगरों के लिए! गाँव के बाशिंदों के लिए एक ढंग की सड़क और बस भी नहीं! क्यों? क्यों इतनी सस्ती और कमतर ज़िन्दगी मान ली गयी है एक गाँव वाले की? जहां पल पल झूठ, बेईमानी, मक्कारी, ठगी, लूट-खसोट की इबारत लिखी जाती रहती है,अच्छे दिनों की सारी सरकारी कवायद उसके हिस्से में,और जहां आज भी सच, ईमान, भोलापन, अपनापन, सहयोग की भावना बची हुई है,उसके हिस्से में भुखमरी,  गरीबी,  अकाल,  अभाव,  बेरुखी....! कहाँ है भारत भाग्य विधाता? 'गरीबी हटाओ' का झुनझुना जैसे पचास सालों तक जनता को बहलाता रहा,वैसे ही 'अच्छे दिनों' का ख्याली पुलाव भी क्या सचमुच कभी पक पायेगा?
     कांग्रेस-भाजपा को कोसने से कुछ नहीं होगा,क्यों कि घूम-फिर कर इन्हें ही आना है!दोष व्यवस्था में है,जो शहरों के वातानुकूलित दफ्तरों में बैठ,मिनरल वाटर पी कर उतना ही सोच पाती है! गाँव से उनको अनाज,दूध,सस्ता श्रम चाहिए और बदले में देने के लिए एक ढंग की सड़क भी नहीं! आखिर गाँव में तरक्की आए भी तो किस रस्ते !
     देश की सेवा की शपथ लेकर बड़ी-बड़ी कुर्सियों पर बैठने वाले मंत्रियों-अफसरों को कुछ वर्षों तक अनिवार्य रूप से गाँवों में बिठाए बिना भारत की आत्मा का कुछ नहीं हो सकता!
     "अच्छे दिनों" का ख़्वाब दिखाने वाले और उनको पार्टी ठेठ भारतीय माने जाते हैं।क्या वे इस पर कुछ विचार करेंगे???
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शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

!! फुटपाथ पर कराहता इन्साफ !!

      !! फुटपाथ पर कराहता इन्साफ !!
      पता नहीं लोग फुटपाथों पर क्यूँ सोते हैं ! क्या फुटपाथों पर सोने वालों को इतना भी पता नहीं कि फुटपाथ 'रईसजादों', 'बेवडों' के कारनामों के लिए बने हैं ! अरे भाई, मरने का इतना ही शौक है तो कोई अन्धेरा कुंआं ढूंढ लो, किसी मल्टी स्टोरी बिल्डिंग से छलांग लगा लो ! यूँ फुटपाथों पर सो कर बेमौत मारे जाने का 'गुनाह' करके क्यूँ किसी सेलेब्रिटी का, नशे में चूर रईस का कोर्ट-कचहरियों में समय खराब करते हो !
      मैं तो कहता हूँ जो गरीब, मुम्बई में बेकरी के बाहर हीरो की गाडी से कुचल कर मारेजाने का 'गुनाहगार' है,उसे माननीय अदालत के माध्यम से नोटिस भेजा जाना चाहिए कि वो पुनः ज़मीन पर आ कर 'हीरो' से और 'माननीय कोर्ट' से उनका अमूल्य समय खराब करने के लिए माफ़ी मांगे, क्योंकि उस भोले मृतक के अलावा सभी जानते थे कि कोर्ट किसी भी रईसजादे का कभी भी कुछ भी बिगाड़ नहीं सकती ! ऐसे में 'माननीय कोर्ट' और 'सम्माननीय हीरोजी' का समय खराब करने की जुर्ररत कैसे की उस 'गरीब' ने !वैसे भी जब आरोपी कोई 'हीरो' हो तो उसे कोई दंड कैसे दिया जा सकता है ? अरे भाई उस पर फिल्मों में करोड़ों-अरबों रुपये लगे होते हैं, क्या एक 'अदद गरीब' की मौत पर किसी का करोड़ों का नुकसान जायज़ है ? और फिर भारत की उस 'मनोरंजन प्रिय' जनता का क्या होगा, जिनका हाजमा इन हीरो की झूठी हिरोगिरी देखे बिना बिगड़ा रहता है ? बेकरी के बाहर हीरो की गाडी से कुचल कर बेमौत मारे जाने वाले ए 'गुनहगार गरीब', ऊपर से इधर निचे देख ज़रा, तेरी मौत पर जितनों ने मातम ना मनाया होगा ना, आज उससे कईं गुना ज्यादा 'पत्थर दिल तमाशबीनों' ने अपने हीरो की बाइज्जत रिहाई पर ढोल-नगाड़ों के साथ जश्न मनाया है ! ले,अब तू करले, क्या कर लेगा?
      बेकरी के सामने हीरो की गाडी से कुचल कर बेमौत मारे जाने वाले ए 'गरीब गुनहगार', इन तेरह सालों में तेरी रूह को तो ऊपर वाले ने ज़रूर सुकून बख्श दिया होगा, किन्तु निचे हीरो और उसके मुरीदों की आत्मा को शान्ति मिलने में पुरे तेरह बरस लग गए तेरे कारण ! अब बोल तुजे क्या सज़ा दी जाए ? मैं तो कहता हूँ हीरो को अब कोई ऐसा ताक़तवर 'पेरवीकार' रखना चाहिए जो 'माननीय कोर्ट' के माध्यम से, ज़न्नत में आराम फरमा रहे, बेकरी के सामने फुटपाथ पर सोकर बेमौत मारे जाने का 'गुनाह' करने वाले उस गरीब को पुनः निचे बुला कर उस पर मुकदमा चलाए !
      बेकरी के सामने फुटपाथ पर सो कर 'खाए-पिए' हीरो की गाडी से कुचल कर मारे जाने का गुनाह करने वाले ए गरीब, तेरा गुनाह तो साबित हो गया......कि तू फूटपाथ पर सोया ही क्यूँ ! लेकिन तुझे किसने कुचल दिया, 'इन्साफ के देवता' ये नहीं बता पाए ! हमारे हीरो को इन्साफ मिल गया.....तुझे मिला ना मिला, क्या फर्क पड़ता है ! हमारी फिल्मों में इन्साफ हीरो ही करता है,यहाँ भी इन्साफ हीरो को मिल गया तो क्या हो गया ! आखिर इन्साफ किसी बेकरी के बाहर फुटपाथ पर सो कर 'रईसजादों-बेवडों' की गाडी से कुचल कर मारे जाने का 'गुनाह' करने वाले 'गरीबों' के लिए था ही कब????? 
'भांड-भक्तों',आज सोना मत........आज जश्न की रात है !!!
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सोमवार, 7 दिसंबर 2015

!! अच्छे दिनों का सरकारी चुटुकला !!

अच्छे दिनों का सरकारी चुटुकला
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 माना जाता है कि हास-परिहास करना सेहत के लिए ठीक रहता है. इस लिहाज़ से केन्द्रीय सरकार सही पटरी पर है. वो अवाम के अच्छे दिन लाने को सतत प्रयत्नशील है. अवाम के अच्छे दिन तो आयेंगे तब आयेंगे,किन्तु अवाम के एक महत्वपूर्ण हिस्से ‘केन्द्रीय कर्मचारियों’ के अच्छे दिन तो आ ही गए हैं !
    केंद्र सरकार ने अपने पचास लाख कर्मचारियों के लिए 'एडवेंचर ट्रिप' का ऐलान किया है! इसका कारण ये बताया गया है कि इससे कर्मचारियों का तनाव घटेगा और टीम भावना का विकास होगा तथा चुनौतियों को स्वीकारने की क्षमता बढ़ेगी !

    केंद्र सरकार का ये अच्छा चुटुकला है. मन हो रहा है पेट पकड़ कर ठहाके लगाऊं !
    अब देखिये,ये चुटुकला नहीं तो और क्या है ! एक तो केंद्र सरकार के कर्मचारी,यानी वैसे ही पाँचों उंगलिया घी में, और अफसरों के तो सिर भी कडाही में ! सरकारी कर्मचारी को तनाव था ही कब? तनाव तो जितना भी है, जो भी है, जैसा भी है, भोलीभाली अवाम के हिस्से में ही है ! सरकारी कर्मचारियों ने तो सारा का सारा तनाव अवाम को दे रखा है, दफ्तरों के चक्कर लगाने और जेबें गर्म करने के लिए! अब जबकि तनाव है ही नहीं तो कम क्या करेंगे !
    सरकारी कर्मचारियों में टीम भावना का विकास करना इस ‘एडवेंचर’ की दूसरी महत्वपूर्ण बात है ! अरे भाई, सरकारी कर्मचारियों के जैसी ‘टीम भावना’ और कहाँ मिलेगी? निचे से लेकर ऊपर तक जैसे मिलबांट कर खाते हैं, कोई दुसरा उदाहरण तो बता दो ऐसा ! जब ऐसी टीम भावना में कोई कसर ही नहीं है, तो उसका विकास क्या ख़ाक करोगे !
    अब रही तीसरी बात. ‘चुनौती’ स्वीकार करने कि क्षमता बढ़ाना ! चुनौती तो वे अवाम के आम आदमी को देते ही रहते हैं ! ‘जब तक तू टेबल के निचे से करारे नोट नहीं सरकाएगा, तेरा काम नहीं होगा! जा तेरी हो जो करले !’ अब इससे ज्यादा चुनौती की क्षमता उनसे और क्या चाहती है केंद्र सरकार !
    कुल मिला कर ऐसे ‘सरकारी चुटुकले’ अच्छे दिनों की संभावनाओं को पुख्ता कर रहे हैं ! ‘अच्छे दिन’ सरकार, सरकारी कर्मचारियों और धन्ना सेठों के आ जाएँ बस ! अवाम का क्या है ! वो तो सदैव ही सरकारों द्वारा दिखाए गए झूठे सपनों पर ही जीती आ रही है ! अच्छे दिनों का एक सपना और सही!! सपनों पर साठ साल गुज़ार दिए तो पांच साल और कौनसी बड़ी बात है!  
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शनिवार, 4 जुलाई 2015

!! दूध का दूध पानी का पानी !!

देख मलाई-रबड़ी जब मुंह में आये पानी,
कैसे करे कोई,दूध का दूध पानी का पानी!
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.....'दूध का दूध पानी का पानी' मुहावरा केवल विपक्ष के लिए बना है.जिसके पक्ष में कुर्सी आई,उसके लिए इस मुहावरे का कोई अर्थ नहीं.बल्कि तब तो ये मुहावरा पक्ष के लिए 'अनर्थ' बन जाता है.इस लिए पक्ष वाले इस मुहावरे से कन्नी काटते हैं और विपक्ष वाले इस मुहावरे को पानी पी पी कर दिन में सौ बार दोहराते है!
.....भाजपा जब संसद में और विधान सभाओं में विपक्ष में बैठा करती थी,तब कांग्रेस के काले कारनामे पर पहली प्रतिक्रिया के रूप में भाजपा के मुंह से 'दूध का दूध पानी का पानी' ही निकलता था!मतलब कि कोंग्रेसियों पर आरोप लगा नहीं कि जांच बिठा दो ताकि 'दूध का ढूध पानी का पानी' हो जाए.लेकिन उस वक़्त 'चुल्लू भर पानी' के मुहावरे को प्राप्त हो चुकी कॉंग्रेस तब भी 'दूध का दूध पानी का पानी' करवाने को हरगिज़ तैयार नहीं होती थी! इधर भाजपा 'पानी पी पी कर' दिन भर 'दूध का दूध पानी का पानी' वाला मुहावरा ठोकती रहती थी! दरसल उस वक़्त कॉंग्रेस के लिए 'दूध का दूध पानी का पानी' मुहावरा अनर्थकारी था सो उसने उसको पानी के साथ निगल कर भुला ही दिया था.
.....चुनाव हुए. हालात बदले. मतदाताओं ने कॉंग्रेस को चुनावों में पानी पिला कर 'शर्म से पानी पानी' कर दिया और भाजपा को सत्ता सौंप दी.दूध का दूध पानी का पानी वाला मुहावरा भुला बैठी कॉंग्रेस जब विपक्ष में आ बैठी तो उसके रणबांकुरों ने पुनः झांड-पोंछ कर दूध का दूध पानी का पानी वाला मुहावरा विपक्ष की टेबल की दराज़ मेसे निकाला और पानी पी पी कर भाजपाईयों के सामने रटने लगे!अब बारी थी भाजपाईयों द्वारा इस मुहावरे को भूल जाने की,क्यूँ कि सत्ता के लिए ये मुहावरा अनर्थकारी जो था! सुषमा-वसुंधरा,मूंडे-तावडे, आदि इत्यादि के लिए कॉंग्रेसी 'दूध का दूध पानी का पानी' वाला राग अलापते रहे,लेकिन भाजपा इस मुहावरे को बिना पानी का घूंट पिए हलक से उदरस्थ करती रही! सत्ता की चौखट पर 'दूध का दूध पानी का पानी' मुहावरा फ़ैल हो गया! होना ही था! बात सीधी सी है. जब सामने मलाई रबड़ी खाने को पड़ी हो तो ऐसे में कोई क्यूँ ये याद रखे कि 'दूध का दूध पानी का पानी' किया जाए?मलाई-रबड़ी उड़ाने के मौके बड़ी मुश्किल से मिलते हैं, ऐसे में सिर्फ दूध को याद रखना मुफीद होता है! आखिर मलाई-रबड़ी दूध से ही बनती है! 'पानी' तो चुल्लू भर या शर्म से पानी पानी वाली स्थिति में हिस्से आना ही है,फिर भला सत्तासुख भोगते हुए क्यूँकर इस पर ध्यान दिया जाए!

.....वैसे भी अब तक की कारस्तानियों से ये पक्का हो चुका है कि सत्ता में बैठे लोग कभी भी 'दूध का दूध पानी का पानी' कर ही नहीं सकते! वे सिर्फ दूध की मलाई,रबड़ी और कलाकंद खा कर हज़म ही कर सकते हैं! 'दूध का दूध पानी का पानी' करने का काम तो अवाम के हिस्से में है, और वो वक़्त आने पर ज़रूर करती है! 'दूध,मलाई,रबड़ी और कलाकंद' खाने वालों को ये ज़रूर याद रखना चाहिए!
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!! मारक मोदी-तारक मोदी !!

!! मारक मोदी-तारक मोदी !!
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.....आजकल देश में 'मोदी' का बोलबाला है!एक मोदी देश को अच्छे दिनों की और लेजा रहा है तो एक मोदी देश में भूचाल ला रहा है!विदेश में बैठा मोदी ट्विटर नाम का लट्ठ लेकर हिन्दुस्तान के तथाकथित जनसेवकों के पीछे ऐसे पडा है कि राज महलों के सुख भोगते भोगते उन्हें दिन में तारे नजर आने लगे हैं!ये विदेश वाला मोदी 'मारक' के रोल में है,और हिन्दुस्तान में पब्लिक को गच्चा देने के माहिर नेताओं को ये विदेश वाला मोदी अब ऐसा गच्चा दे रहा है कि साँसे हलक में अटक गयी है!
.....केंद्र सरकार का एक साल बड़ी शान्ति से,दागरहित गुजरा,और उसका जश्न अभी शुरू ही हुआ था कि विदेश में बैठे 'मारक' मोदी ने इनका बेंड बजाना शुरू कर दिया!इधर महाराष्ट्र में सत्ता का नया नया स्वाद चख रहे 'मूंडे-तावडे' आदि इत्यादि अति उत्साह में घोटालों के लपेटे में आ गए!जैसे 'मौनीबाबा' की कॉंग्रेसी सरकार के घोटाले एक के बाद एक खुलते गए और उसके अंतिम संस्कार के बाद ही बंद हुए वैसे ही,अभी भाजपा के राज में एक के बाद एक घोटाले और विदेशी 'मारकमोदी' के 'ट्वितीर' ने शांत समंदर को सुनामी के हवाले कर दिया है!
.....इधर प्रधानमन्त्री 'तारकमोदी','मौनमोहन' की राह चल पड़े हैं!अपने चमकते-दमकते सितारों पर विदेशी 'मारकमोदी' के 'ट्वितीरों' पर उन्होंने चुप्पी साध ली है!इस चुप्पी को क्या समझा जाए? दुःख?! गुस्सा!!?? याकि डूबने वाले को पूरा डूब जाने तक चुपचाप देखने की कला!!!???
बहरहाल,विदेश में बैठा 'मारकमोदी',चाची-भतीजे,जीजी-जीजा आदि आदि को भी लपेटे में ले चुका है!अब आगे और किसका नंबर आने वाला है,ये ट्विटर महाराज ही बता सकते हैं!सत्ता में बैठ कर मलाई खाने वालों के लिए 'मारकमोदी' चुल्लू भर पानी का इंतजाम किये जा रहा है!
.....इधर एक बात समझ नहीं आ रही,कि 'मौनीबाबा' के राज में कॉंग्रेस के काले कारनामों की जांच करवा कर दूध का दूध पानी का पानी करने की मांग करने वाले वर्तमान के सत्ताधीश,'मारकमोदी' के चेलों की जांच करवा दूध का दूध पानी का पानी क्यूँ नहीं कर लेते?क्या इसलिए तो नहीं कि ये दिन दूध की मलाई-रबड़ी खाने के हैं और ऐसेमें  उसमे से पानी को अलग करने का ख्याल नहीं आ रहा?

.....जो भी हो,मजा तो तब आये जबकि दो-चार और 'मारकमोदी' विदेश में या देश में बैठे हों और सफ़ेदपाशों के काले कारनामें उजागर करते रहे!आखिर स्वच्छ भारत अभियान के लिए ये भी कोई कम कारगर नहीं है!
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मंगलवार, 30 जून 2015

!!पगडण्डी!!

!!पगडण्डी!!
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......क्या आपको गाँव की पगडण्डी याद है?अरे वही जो गाँव में कहीं से भी शुरू हो कर कहीं भी चली जाती थी! सड़कें थी ही कहां! कच्चे रस्ते दूर तलक चले जाते थे.साथ साथ पगडण्डीयां भी चलती रहती थी! गाँव में सुबह सवेरे उठ कर जंगल जाना हो या फिर पनघट पर या कि माता जी के मंदिर जाना हो या किसी खुले मैदान में,बस पगडण्डीयां ही सहारा थी.
......इन पगडंडियों पर कितना अपनत्व पलता था! कभी कभार किसी पगडण्डी पर कोई काँटा गिर जाता या कि बड़ा सा पत्थर, जिस भी राहगीर को पहले दिख जाता वो उसे हटाये बिना आगे नहीं बढ़ता! पीछे आने वाले राहगीर की ये चिंता ये ख्याल उस पगडण्डी पर चलने वालों की विशेषता थी! धूल से सनी उजली पगडंडियों के जमाने में उस पर चलने वाले पथिकों के दिल भी उजले हुआ करते थे! आज की सरकारी सड़कें काली कलूटी, जिस पर फुर्र से अपनी ही धुन में गुजर जाने वालों के दिल भी कमोबेश उसी सरकारी काली सड़क के रंग में रंग से गए हैं! इन सड़कों पर कौन आया, कौन गया, किसे याद रहता है! इन काली कलूटी सड़कों पर इंसान कहाँ हैं! इन पर तो सिर्फ वे मशीनें दौड़ती हैं, जिनके सीने में दिल नहीं है. ये मशीने कहाँ पहचानती है इंसानों को! इंसान हो या जानवर इन्हें उनसे कहाँ बात करना आता है! कहाँ उनके साथ चलना, सम्बन्ध बनाना आता है! रिश्ते की गर्माहट उनमें कहाँ! ये तो बस कुचल सकती हैं उनको! सडकें ले जाती है जरुर हमें, लेकिन उस मुकाम पर नहीं पहुंचाती, जहां इंसान,इंसानियत,अपनापन आदि मिले! पगडण्डी ले जाती हैं वहां, जहां इंसान,इंसानियत और अपनापन है! पगडंडियों का कहाँ मुकाबला कर पाती है सड़कें!
......पगडण्डी पर बतियाते हुए पैदल चलते चलते कब कितना रस्ता कट जाता था, किसी को पता ही नहीं चलता! पगडंडियों के आस पास की प्रकृति से राहगीर का सहज संवाद चलता रहता.कंकड़,पत्थर,कांटें,कीड़े-मकोड़े सभी साथ साथ चलते! ना पीछे रहने का गम था ना ही आगे निकल जाने की आपाधापी! आसपास आते जाते हर राहगीर से बातचीत का सिलसिला निकल पड़ता था, जो किसी निकट-दूर के रिश्तेदार से पहचान निकलने तक जा पहुंचता था! इन्हीं पगडंडियों पर कईं सम्बन्ध-रिश्तेदारियाँ भी बन जाती! सही मायने में ये पगडण्डीयां दिल से निकल कर दिल तक पहुंचा करती थी! पगडंडियों का हमराह बना इंसान कब अपने मुकाम पहुँच जाता उसे भी पता नहीं चलता!
......आज कहाँ है पगडण्डीयाँ! कोलतार-सीमेंट की सड़कें निगल गयी इन पगडंडियों को बिलकुल वैसे ही,जैसे स्वार्थ ने इंसानियत को निगल लिया! पगडंडियों पर चलता इंसान बचा हुआ था, उसकी इंसानियत जिंदा थी, उसमें जमीर था, अपनापन था, मुहब्बत थी! पगडंडियाँ जिंदा रखे हुए थी इंसान को! आज की पीढ़ी को पगडण्डी के बारे में मालूम ही कहाँ! हमने भी कब बताया उनको! जरुरत ही नहीं समझी कभी कि इंसान से सरोकार रखने वाली पगडंडी को कभी किस्से-कहानियों में ही सही,अपने बच्चों को बताएं! आखिर हमें सड़कों से ही फुर्सत कहाँ! सरपट भागती जिन्दगी में सड़कें ही तो हो सकती है.....पगडण्डी कहाँ से आए! लेकिन रखना चाहिए,उस पीढ़ी को अपनी बातों किस्सों-कहानियों में पगडण्डी को जरूर रखना चाहिए, जिस पीढ़ी ने पगडंडियों के साथ बहुत सा वक्त गुजारा है. आप भी कभी कभार याद कर लिया कीजिये उन भूली बिसुरी पगडंडियों को........शायद आपको ये बहुत सी सुकून भरी पुरानी बातें भी याद दिला दें!
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