शनिवार, 29 जनवरी 2011

!! मुक्तिका !!

***** !!  तन्हाईयों का शहर !!*****

तन्हाईयों का घर है !

ये शहर है !!
हर जगह है मेला,
शख्श तन्हा मगर है !!
साथ-साथ है सभी,
किन्तु मन में डर है !!
काम,काम बस काम,
ना शाम ना सहर है !!
खाली है आसमां लेकिन,
परिंदे बे-पर है !!
माफ़ करना ''अशोक'',
बातें मेरी ग़लत अगर है !!.
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1 टिप्पणी:

  1. सुंदर रचना .आज मैंने यह तीसरी सार्थक लघु कविता पढ़ी है.
    माफ़ करना ''अशोक'',
    बातें मेरी ग़लत अगर है..नहीं साहिब आपने अच्छा सच लिखा है.

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