शनिवार, 15 दिसंबर 2012

!! दिल से !!

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जब मयस्सर ना हो
रोशनी सूरज की,
जब ना दिखे
दीपक दूर-दूर तक
टिमटिमाता कोई,
जब कोई जुगनू
गुज़रे भी ना
आस-पास से,
और उतर जाए
घना अन्धकार
भीतर तक,
तब
'स्व-चिंतन' की
एक चिंगारी
कर देती है रोशन
पथ को,
जिस पर चलते हुए
मिल जाते हैं
झुण्ड जुगनुओं के,
सजने लगाती है
दीप मालाएं,
और
कईं-कईं सूरज
उगने लगते हैं !
'स्व- चिंतन' की चिंगारी से
अंधेरों को
भष्म होना ही होता है !!

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2 टिप्‍पणियां:

  1. मित्रों!
    13 दिसम्बर से 16 दिसम्बर तक देहरादून में प्रवास पर हूँ!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (16-12-2012) के चर्चा मंच (भारत बहुत महान) पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  2. बहुत जरूरी है स्‍वचिंतन...सही लि‍खा आपने

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