सोमवार, 14 मई 2012

!! भगवान भरोसे रेल यात्री !!


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.......... रेल मंत्रालय समय-समय पर रेल भाडा बढाने में कोई कोताही नहीं करता,क्योंकि उसे घाटे से उबरना होता है और रेल यात्रियों की सुविधाएं बढानी होती है.लेकिन कमाल की बात ये है कि साधारण टिकिट और स्लीपर क्लास में यात्रा करने वाले हमेशा से ही कष्टप्रद यात्रा करने को ही विवश रहे हैं ! रेल मंत्री और अधिकारियों की नज़र में केवल उच्च श्रेणी में यात्रा करने वाले यात्री ही सुविधाओं के हक़दार होते हैं,बाकी के तमाम यात्री तो महज़ भेड़-बकरी हैं,जो ठूंस-ठुंसा कर अपने गंतव्य तक पहुँच ही जायेंगे!
.......... साधारण टिकिट पर यात्रा करने वाले तो किसी तरह की सुविधा मांगने का अधिकार ही नहीं रखते--सरकारी निति तो यही बताती है ! स्लीपर क्लास के यात्री कुछ सुविधा मांग सकते हैं,लेकिन देने की निति सरकार की नहीं होती है ! रेल मंत्रालय का पैसा कमाने  का जुनून ऐसा कि एक बार तो स्लीपर क्लास को 'दबड़े' में ही परिवर्तित कर दिया था ! बोगी में 'साईड' की दो 'बर्थ'को तीन में परिवर्तित करके यात्रियों को 'काल कोठारी' की सज़ा देदी थी,लेकिन बाद में जब हो हल्ला मचा तब, पूरी की पूरी ''राजशाही बोगी'' लेकर ही सफ़र करने वाले अधिकारियों और मंत्री की नींद खुली और यात्रियों को सज़ा से मुक्ति मिली !
.......... अब 'बम्पर' 'वेटिंग' ने 'स्लीपर क्लास' की यात्रा को नरक में परिवर्तित कर दिया है ! 'वेटिंग' का टिकिट लेने वाले यात्री उसे 'कन्फर्म' मान कर ही यात्रा करते है.....और 72 'बर्थ' पर सौ-सवा सौ की भीड़ होना मामूली बात है ! रेल मंत्रालय की तो पाँचों उंगलिया घी में है ! 'स्लीपर क्लास' का आरक्षित टिकिट आपके पास है तो बस आप अपनी सीट पर बैठ भर सकते हैं.....बाद में हिलना-डुलना या शौचालय तक जाना आपके हाथ में नहीं है, क्यों कि 'वेटिंग' वाले,सामान सहित शौचालय के अन्दर से लेकर बाहर तक पसरे रहते हैं ! ऐसे में गुंडों-बदमाशों और चोर-उचक्कों को अपना काम करने में आसानी रहती है,यह भी रेल मंत्रालय की उन के ऊपर मेहरबानी ही है !
.......... सप्ताह भर पहले की बात है.मेरे एक परिचित की पत्नी अपने पीहर वालों के साथ 'स्लीपर क्लास' में यात्रा कर रही थी.रात के लगभग तीन बजे का वक़्त था,वह शौचालय में गयी.शौचालय में पहले से ही घात लगाए बैठे एक 'नकाबपोश' बदमाश ने चाक़ू की नौक पर जान की धमकी देकर उस महिला से तमाम जेवर और जो भी नकदी उसके पास थी लूट ली,और चम्पत हो गया.रेल मंत्रालय द्वारा यात्रियों की सुरक्षा में तैनात किया गया एक भी 'कर्तव्यपरायण सिपाही' कहीं दूर-दूर तक भी नज़र नहीं आया ! लूटी-पिटी महिला इतनी दहशत में थी कि बहुत देर तक बोल भी नहीं पायी.आखिर इस घटना का जिम्मेदार कौन है? क्या रेल मंत्रालय की जिम्मेदारी सिर्फ टिकिट बेचने भर की है,और उसके बाद मुसाफिर को तमाम तरह के जोखिमों के साथ अपनी जिम्मेदारी पर ही सफ़र करना है ? क्या रेल में तैनात सिपाहियों की ड्यूटी मात्र रेल में 'तफरी' करने और रात के समय 'डंडा फटकारते' हुए मौक़ा देख कर मजबूर यात्रियों से 'पैसा' वसूल करने तक ही सिमित है ? टटपूंजिया नेता और ऐरे-गैरे अधिकारी को दसियों पुलिस की सुरक्षा देने वाली सरकार रेल की एक-एक बोगी में दो-दो-तीन-तीन पुलिस के सिपाहियों को क्यूँ नहीं तैनात कर सकती? और 'स्लीपर क्लास' में 'वेटिंग' वालों को, असीमित भीड़ के रूप में घुसने का अधिकार दे कर यात्रा को नारकीय बना देना कैसी समझदारी है ?
.......... बेतरतीब भीड़-भाड़ में चोर-उच्च्क्कों की बन आती है,और भीड़ का हिस्सा बनने को मजबूर बना दिए गए यात्री माल और जान की जोखिम पर यात्रा करने को विवश है. 'ए.सी.'में बिराजने वाले रेलवे के अधिकारी और मंत्री क्या 'स्लीपर क्लास' और साधारण बोगी में भेड़-बकरियों की तरह,जान-माल को खतरे में डाल कर यात्रा करने को मजबूर यात्रियों की समस्या की तरफ गौर करेंगे ?
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2 टिप्‍पणियां:

  1. rail me yatra kerna aur jang jitna lagbbhag ek jaise hai...kabhi koi seet khali raj jaye to uski boli tt jam kr lagate hai,

    badiya post

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  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    --
    मेरे भारत की धरती पर जो आतंक मचायेगा।
    उसे नाज-नखरों से बन्दीघर में पाला जायेगा।।

    अतिथि देवो भव की, मर्यादा को क्योंकर छोड़ेंगे,
    बैर-भाव को भुला, शत्रु से नातेदारी जोड़ेंगे,
    हो अक्षम्य अपराध भले ही, प्राण नहीं लेंगे उसके,
    हमें मिलेगी रूखी रोटी, वो बिरयानी खायेगा।
    उसे नाज-नखरों से बन्दीघर में पाला जायेगा।।

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